श्योपुर। (Cactus farming) खेती किसानी के नए दौर में अब किसान सिर्फ पारंपरिक फसलों पर निर्भर नहीं हैं। वे अब ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं, जो कम लागत में ज्यादा लाभ दे सकें और पर्यावरण के अनुकूल भी हों। इसी दिशा में किसानों के लिए एक नई पहल की गई है — कांटारहित कैक्टस की खेती।
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किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग द्वारा खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ग्रीन-एजी परियोजना के अंतर्गत श्योपुर जिले के किसानों का एक दल सीहोर जिले के आईसीएआरडीए केंद्र, अमलाहा पहुँचा। इस दल में राज्य तकनीकी समन्वयक डॉ. नीलम बिसेन पवार, संचार अधिकारी श्रीमती मिली मिश्रा और पशुपालन विशेषज्ञ अमृतेश वशिष्ठ शामिल थे। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य किसानों को कांटारहित कैक्टस की खेती और उसके अनेक उपयोगों के बारे में जानकारी देना था। (Cactus farming)
कैक्टस खेती की खासियतें जानकर उत्साहित हुए किसान
आईसीएआरडीए की वैज्ञानिक डॉ. नेहा तिवारी ने किसानों को बताया कि कैक्टस एक ऐसा पौधा है जो बेहद कम पानी में भी आसानी से उग सकता है। यह पौधा शुष्क और बंजर जमीन में भी अच्छी तरह पनपता है, इसलिए सूखे या पानी की कमी वाले इलाकों के लिए यह खेती बहुत फायदेमंद मानी जाती है। (Cactus farming)
उन्होंने बताया कि कांटारहित कैक्टस की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कांटे नहीं होते, जिससे यह पशुओं के लिए हरे चारे का बेहतरीन विकल्प बन जाता है। गर्मी और सूखे के समय जब हरा चारा मिलना मुश्किल होता है, तब कैक्टस का पौधा पशुपालन के लिए सहारा बनता है। (Cactus farming)
बायोगैस और खाद बनाने में भी उपयोगी
प्रशिक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी बताया कि कैक्टस से सिर्फ चारा ही नहीं, बल्कि बायोगैस और जैविक खाद भी तैयार की जा सकती है। इससे किसानों को खेती के साथ-साथ ऊर्जा और खाद का भी वैकल्पिक स्रोत मिल सकता है।
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डॉ. नेहा तिवारी ने बताया कि कैक्टस में पानी की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह पशुओं को ऊर्जा प्रदान करता है और सूखे मौसम में उनके पोषण की जरूरतों को पूरा करता है। (Cactus farming)
किसानों ने किया खेतों में प्रत्यक्ष अवलोकन
अमलाहा केंद्र पहुंचकर किसानों ने कांटारहित कैक्टस की विभिन्न किस्मों का खेतों में जाकर अवलोकन किया। उन्होंने इसकी रोपाई, सिंचाई और रखरखाव की तकनीक को समझा। किसानों का कहना था कि यह खेती पारंपरिक खेती से अलग और आसान है, क्योंकि इसमें ज्यादा पानी, खाद या देखरेख की जरूरत नहीं होती। (Cactus farming)
श्योपुर से आए एक किसान ने बताया, “अगर यह पौधा सूखे इलाकों में भी उग जाता है तो हमें पशुओं के चारे की चिंता नहीं रहेगी। इसके साथ अगर इससे बायोगैस या खाद भी बनती है, तो यह हमारी आय बढ़ाने में बड़ी मदद करेगा।” (Cactus farming)
पर्यावरण संरक्षण और आय दोनों में लाभ
ग्रीन-एजी परियोजना के तहत किसानों को न केवल नई तकनीकें सिखाई जा रही हैं, बल्कि उन्हें जैव विविधता संरक्षण और सतत कृषि पद्धति अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। यह परियोजना वर्तमान में श्योपुर और मुरैना जिलों में चल रही है, जिसका मकसद है – जलवायु परिवर्तन के अनुरूप खेती को तैयार करना और भूमि संरक्षण को बढ़ावा देना। (Cactus farming)
परियोजना से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि कांटारहित कैक्टस की खेती पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और भूमि कटाव भी कम होता है। यह पौधा कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वायुमंडल की शुद्धता बनाए रखने में मदद करता है। (Cactus farming)
किसानों की आय में नया इजाफा संभव
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का नया माध्यम साबित हो सकती है। इसके फलों से कई औषधीय और प्रसंस्कृत उत्पाद बनाए जा सकते हैं। साथ ही, पशुपालक किसान सूखे मौसम में भी हरियाली और चारे की कमी से मुक्त रह सकते हैं। (Cactus farming)
कुल मिलाकर, ग्रीन-एजी परियोजना किसानों को न सिर्फ नई तकनीकों से जोड़ रही है, बल्कि उन्हें सतत और पर्यावरण अनुकूल खेती की दिशा में आगे बढ़ा रही है। कांटारहित कैक्टस की खेती इसी सोच का एक उदाहरण है, जो भविष्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। (Cactus farming)