देवरी इलाके में एक बार फिर लापरवाही ने बड़ा हादसा होते-होते टाल दिया। रिछावर रोड पर स्कूल से लौट रही एक बच्ची की स्कूटी उस जगह पहुंची, जहां पुलिया पूरी तरह टूट चुकी थी। स्कूटी का अगला पहिया अचानक धंस गया और गाड़ी पलटने वाली ही थी, लेकिन समय रहते ड्राइवर ने संभाल लिया और जान बच गई।
ये घटना केवल एक संयोग से टली, लेकिन सवाल उठता है कि कब तक ऐसी लापरवाही चलेगी? क्या अधिकारी और ठेकेदार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?
हर तरफ खुदाई, लेकिन मरम्मत नहीं!
देवरी क्षेत्र में विकास के नाम पर हर गली, हर सड़क को खोद दिया गया है। कहीं पाइप लाइन तो कहीं सड़क चौड़ीकरण, पर इन कामों के बाद मरम्मत करने की कोई फिक्र नहीं की जाती। जगह-जगह सड़कें अधूरी पड़ी हैं, पुलिया टूट चुकी हैं, और लोगों को रोज़ जान जोखिम में डालकर गुजरना पड़ रहा है।
जनता की सुनवाई नहीं
स्थानीय लोग बार-बार ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों को मौखिक और लिखित रूप से सूचित कर चुके हैं कि कुछ जगहों पर पुलिया पूरी तरह टूट चुकी है और हादसा कभी भी हो सकता है। लेकिन ना तो ठेकेदार इन बातों पर ध्यान देते हैं और ना ही प्रशासनिक अमला।
ऐसा लगता है मानो किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार किया जा रहा है ताकि तब जाकर कोई कार्रवाई हो।
खबरें छपने के बाद भी नहीं जाग रहे जिम्मेदार
स्थानीय अखबारों में इस मुद्दे को कई बार प्रमुखता से उठाया गया है। ‘पत्रिका’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने बार-बार खबरें प्रकाशित कर प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की, फिर भी हालात जस की तस बने है।
आखिर सवाल यह उठता है कि जब मीडिया भी जनहित में लगातार रिपोर्टिंग कर रही है, तो फिर ठेकेदार और अफसर आंखें मूंदे क्यों बैठे हैं?
क्या किसी ताकतवर का संरक्षण है ठेकेदार को?
स्थानीय लोगों का मानना है कि शायद इस पूरे मामले में किसी रसूखदार व्यक्ति का हाथ है, जिसके चलते ठेकेदार बेखौफ होकर काम को अधूरा छोड़ दे रहा है। प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत बनी इन पुलियों और सड़कों की जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है, लेकिन उसकी जवाबदेही तय करने वाला कोई नजर नहीं आता।
अगर कोई बड़ा हादसा हो जाता है, तो आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? जनता अब यह सवाल खुले तौर पर पूछ रही है।
बच्चों की जान जोखिम में
रिछावर रोड से हर दिन सैकड़ों बच्चे स्कूल आने-जाने के लिए गुजरते हैं। जिस जगह हादसा टला, वहां से रोज़ बुजुर्ग, बच्चे, बाइक और वाहन चालक आते-जाते हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि टूटी हुई पुलिया पर कोई चेतावनी बोर्ड या संकेत तक नहीं लगाया गया है। ऐसे में ज़रा सी गलती भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
जनहित से जुड़ी खबरें अनदेखी क्यों?
‘पत्रिका’ जैसी संस्थाएं जब जनहित की खबरें बार-बार प्रकाशित कर रही हैं, तब भी अगर जिम्मेदार लोग एक्शन नहीं ले रहे हैं, तो यह जनता के साथ अन्याय है। आखिर एक आम नागरिक की जान की कीमत क्या सिर्फ एक आंकड़ा भर बनकर रह गई है?
सरकार, प्रशासन और संबंधित विभागों को अब जागने की जरूरत है। अगर जल्द ही मरम्मत कार्य नहीं शुरू किया गया, तो आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ खबर नहीं, बल्कि अफसोस का कारण बन सकता है।