सिलवानी एक तरफ सरकार ने 4 करोड़ रुपये खर्च कर 12 गांवों में गौशालाएं बना दीं, दूसरी तरफ शहर की सड़कों, गलियों और खेतों में आज भी बेसहारा मवेशियों का कब्जा है। हालत ये है कि स्टेट हाइवे-15 और 44, गांधी चौक, बजरंग चौराहा से लेकर सिलवानी की तंग गलियों तक हर जगह गाय-बछड़े खुलेआम घूमते नजर आते हैं।
दिन हो या रात, हर वक्त दुर्घटना का खतरा बना रहता है। कभी वाहन ब्रेक लगाकर बचते हैं, तो कभी टक्कर हो ही जाती है।
“तीन चरणों में करोड़ों खर्च, फिर भी सड़कों से गाय-बछड़े नहीं हटे”
मनरेगा के तहत तीन चरणों में करीब 4 करोड़ रुपये खर्च कर उचेरा, जमुनिया, सियरमऊ, डाबरी, जैथारी, शालाबर्रू, सांईखेड़ा, मनकवाड़ा, पठापोड़ी, मुआर, चीकली और कुअंरखड़ी गांवों में 1600 गौवंश क्षमता वाली गौशालाएं बनाई गईं।
हर महीने इन गौशालाओं के लिए लाखों रुपये का चारा-पानी का अनुदान भी दिया जा रहा है, फिर भी सड़कों पर मवेशियों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही।
फोरलेन पर हर पल हादसे का डर
सियरमऊ घाटी, बेगम नदी, और बेंगवा पुल जैसे संवेदनशील इलाकों में मवेशी सड़क के दोनों किनारों और रेलिंग तक फैले रहते हैं।
भारी वाहन जैसे ही आते हैं, उन्हें आखिरी पल में ब्रेक लगाना पड़ता है। पिछले 6 महीनों में दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं और कई दुकानों को भी मवेशियों की टक्कर से नुकसान पहुंचा है।
खेतों की फसल चट कर रहे बेसहारा मवेशी
गौशाला की सुविधा के बावजूद कई पशुपालक रात के अंधेरे में अपने मवेशी छोड़ देते हैं।
रात होते ही झुंड के झुंड खेतों में घुस जाते हैं और सोयाबीन, उड़द, सब्जी की फसल साफ कर जाते हैं।
किसान रामबाबू रघुवंशी कहते हैं, “रोज रात भर जागकर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है, वरना पूरी फसल नष्ट हो जाती है।”
प्रबंधन पंचायतों के हवाले, पर पारदर्शिता नदारद
गौशालाओं का संचालन ग्राम पंचायतों के जिम्मे है, लेकिन न तो इनमें पूरे मवेशी रखे जा रहे हैं और न ही चारा-भूसे का हिसाब सार्वजनिक किया जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये गौशालाएं सिर्फ कागजों पर चल रही हैं। जमीनी स्तर पर इनका कोई असर नहीं दिख रहा।
स्थायी समाधान की उठी मांग
गौसेवक मुकेश साहू, वीरेंद्र साहू और श्रीप्रकाश श्रीवास्तव ने मांग की कि सरकार को अब पंचायत स्तर की बजाय जिला स्तर पर बड़ी गौशाला या कांजी हाउस (गोपशु आश्रय गृह) बनाना चाहिए।
उनका कहना है, “पशुपालकों पर सख्त जुर्माना लगाया जाए, ताकि वे जानवरों को यूं ही सड़कों पर न छोड़ें। जब तक सख्ती नहीं होगी, हालात नहीं सुधरेंगे।”
प्रशासन की प्रतिक्रिया
एसडीओपी अनिल मोर्य ने कहा, “सड़कों पर मवेशियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अभियान को और सख्ती से चलाया जाएगा। पशुपालकों को समझाया जा रहा है, लेकिन अगर वे नहीं माने तो कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।”