लखनऊ। राजधानी लखनऊ और आसपास के ग्रामीण इलाकों की जीवनदायिनी कही जाने वाली रेठ नदी आज खुद अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। वर्षों से इसे पुनर्जीवित करने की सरकारी योजनाएं कागजों में बनती तो रहीं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं उतरा। अफसरों और जनप्रतिनिधियों की लापरवाही के चलते यह नदी दिन-ब-दिन सूखती जा रही है, जिससे किसानों की परेशानी बढ़ती जा रही है।
मनरेगा के तहत बनी थी योजना, लेकिन…
रेठ नदी को लेकर प्रशासन ने साल 2021-22 में मनरेगा के तहत रिवाइवल एक्शन प्लान बनाया था। तत्कालीन जिलाधिकारी अभिषेक प्रकाश और विधायक अविनाश त्रिवेदी की मौजूदगी में योजना तैयार की गई और खंड विकास अधिकारी पूजा सिंह के नेतृत्व में लाखों रुपये का बजट भी पास हुआ। लेकिन जैसे ही कोरोना महामारी का दौर आया, यह योजना अधर में लटक गई और फिर कभी दोबारा काम शुरू नहीं हुआ।
नदियों के लिए सिर्फ भाषण, जमीन पर सन्नाटा
नदी की हालत सुधारने के लिए अधिकारियों ने पौधरोपण, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग, सोकपिट और हैंडपंप निर्माण जैसे कई उपायों का जिक्र तो किया, लेकिन हकीकत यह रही कि कुछ जगहों पर थोड़ी-बहुत खुदाई कर के बजट खत्म दिखा दिया गया। उसके बाद न तो दोबारा फंड मिला और न ही अफसरों ने कोई रुचि दिखाई। आज हालत यह है कि रेठ नदी का उद्गम स्थल भी पूरी तरह सूख चुका है।
किसानों के लिए जीवनरेखा है रेठ नदी
रेठ नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि हजारों किसानों के लिए जीवनरेखा है। बीकेटी तहसील के कुम्हरावां, खजुरी, बाजपुर गंगौरा, सरांवा, इंदारा और करीमनगर जैसे गांवों से होकर यह नदी बहती थी और बाराबंकी के निंदूरा ब्लॉक में गोमती से मिलती थी। इन गांवों के खेतों को यही नदी सींचती थी, लेकिन अब यह धारा गंदगी और सूखे की शिकार हो गई है।
किसानों की पीड़ा: “रेठ मर गई, हम कैसे जिएं?”
बीकेटी के इंदारा गांव के किसान नेता अमर सिंह यादव की आंखों में इस नदी के सूखने का दर्द साफ झलकता है। उनका कहना है, “यह नदी हमारे खेतों को जीवन देती थी। अब यह सूख गई है, तो हमारी फसलें भी सूख रही हैं। प्रशासन बस फाइलों में योजना बनाता है, जमीन पर कुछ नहीं होता।”
अमर सिंह बताते हैं कि इस नदी का पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह न सिर्फ जल का स्रोत थी, बल्कि गांवों की आत्मा थी। अब इसकी हालत देखकर गांववाले खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार यह मुद्दा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर सांसद-विधायक तक के सामने उठाया गया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि अधिकारी और जनप्रतिनिधि फोटो खिंचवाकर निकल जाते हैं, लेकिन नदी के हालात पर नज़र डालना जरूरी नहीं समझते।
बेतरतीब गंदगी और लापरवाही ने बिगाड़ी हालत
नदी की बर्बादी के पीछे एक कारण यह भी है कि आसपास के गांवों के लोग इसमें लगातार कचरा और गंदगी फेंकते हैं। सफाई और संरक्षण को लेकर न कोई जागरूकता है और न प्रशासन की ओर से कोई सख्ती। नतीजा ये है कि नदी अब बीमार हो चुकी है।
निष्कर्ष
रेठ नदी को पुनर्जीवित करने की जो योजनाएं बनाई गई थीं, वे आज तक कागजों से बाहर नहीं निकलीं। किसानों की मांग है कि अब और देर न की जाए और मुख्यमंत्री स्तर पर इस पर ठोस कार्ययोजना बने। यदि समय रहते इसे जीवन नहीं दिया गया, तो यह नदी इतिहास बन जाएगी और इसके साथ हजारों किसानों की उम्मीदें भी।