विंध्यवासिनी माता का शक्तिपीठ: सलकनपुर मंदिर की पौराणिक गाथा और चमत्कारी मान्यताएं
Dainik history Bhopal
मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में स्थित सलकनपुर का विजयासन मंदिर, केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, शक्ति और चमत्कारों का जीवंत केंद्र है। यह मंदिर देवी दुर्गा के विजयस्वरूप ‘विंध्यवासिनी बीजासन माता’ को समर्पित है, जिन्होंने इसी स्थल पर रक्तबीज नामक राक्षस का संहार कर विजय प्राप्त की थी।
माना जाता है कि इसके बाद देवी ने यहीं आसन ग्रहण किया और तभी से यह स्थल ‘विजयासन शक्तिपीठ’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
- मंदिर का भौगोलिक व आध्यात्मिक स्वरूप
- यह प्राचीन मंदिर 800 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।
- श्रद्धालुओं को यहां तक पहुंचने के लिए 1000 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
- रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे बुजुर्गों व असमर्थ लोगों को सहायता मिलती है।
- मंदिर का संपूर्ण प्रबंधन सलकनपुर ट्रस्ट द्वारा किया जाता है और हाल ही में इसका जीर्णोद्धार भी संपन्न हुआ है।
विजयासन देवी की महिमा: मनोकामनाओं की पूर्ति का धाम
कहा जाता है कि यहां निसंतान महिलाएं संतान की प्राप्ति के लिए मन्नत मांगती हैं और देवी उनकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी करती हैं।
देवी की दक्षिणमुखी पाषाण मूर्ति विशेष आकर्षण का केंद्र है।
मंदिर के सामने भैरव बाबा की मूर्ति भी विराजमान है।
नवरात्रों में लगता है लाखों भक्तों का मेला
हर वर्ष चैत्र और शारदीय नवरात्रों में यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। लोग यहां मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए नारियल, चुनरी और मिठाई अर्पित करते हैं।
पहाड़ी पर देवी के चमत्कारी दर्शन
मान्यता है कि देवी ने यहां कन्या रूप में दर्शन दिए थे।
पहाड़ी के चढ़ाव में चट्टानों और प्रकृति की गोद में बसे दर्शन मार्ग पर भक्तों को अद्भुत शांति व ऊर्जा का अनुभव होता है।
कैसे पहुंचे सलकनपुर?
भोपाल से दूरी: लगभग 70 किलोमीटर
सीहोर से दूरी: लगभग 80 किलोमीटर
सड़क मार्ग से सीधी बस या टैक्सी सेवा उपलब्ध है।
सलकनपुर: जहां आस्था और शक्ति का संगम होता है
सलकनपुर का विजयासन शक्तिपीठ आज भी श्रद्धालुओं के लिए एक चमत्कारी स्थल है। यहां आने वाले भक्त खाली हाथ नहीं लौटते — उनकी झोली देवी की कृपा से भर जाती है। चाहे नवरात्रों का उत्सव हो या सामान्य दिन, यह स्थान हर दिन एक दिव्यता की अनुभूति कराता है।
“विजयासन माता का यह पवित्र धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि देवी के उस विजय रूप की याद है जिसने अधर्म पर धर्म की विजय को संभव किया।”
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