देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद अब नया उपराष्ट्रपति कौन होगा, इसे लेकर सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए धनखड़ ने जैसे ही इस्तीफा दिया, एनडीए में उनके उत्तराधिकारी को लेकर मंथन शुरू हो गया है। इस बार एनडीए किसी पिछड़े या अति-पिछड़े वर्ग के नेता को उपराष्ट्रपति पद की दौड़ में आगे लाकर जातीय संतुलन साधने की कोशिश कर सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह का नाम सबसे आगे चल रहा है। हरिवंश का राज्यसभा में कार्य अनुभव, उनकी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व एनडीए नेतृत्व का भरोसा उन्हें इस पद के लिए मजबूत दावेदार बनाता है।
जातीय समीकरणों का भी रखा जा रहा है ध्यान
बताया जा रहा है कि एनडीए नेतृत्व इस बार किसी ऐसे नेता को चुनने पर विचार कर रहा है, जो सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग से आते हों। इसकी एक बड़ी वजह आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव भी हैं। ऐसे में रामनाथ ठाकुर का नाम भी चर्चा में है, जो पूर्व मुख्यमंत्री और भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के बेटे हैं। रामनाथ ठाकुर नाई समुदाय से आते हैं और अति-पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे एनडीए को सामाजिक समीकरणों में लाभ मिल सकता है।
महिला चेहरा भी हो सकता है उपराष्ट्रपति!
इस बीच भाजपा महिला सशक्तिकरण के एजेंडे को ध्यान में रखते हुए किसी महिला नेता को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना सकती है। वसुंधरा राजे, जो राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, उनका नाम भी दौड़ में है। पार्टी सूत्रों की मानें, तो अगर महिला नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है तो यह एक बड़ा सियासी संदेश होगा।
इन नामों की भी हो रही चर्चा
- जेपी नड्डा – भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष। अगर इन्हें चुना जाता है, तो इससे पहले कैबिनेट में बदलाव संभव है।
- मुख्तार अब्बास नकवी – पूर्व केंद्रीय मंत्री और अल्पसंख्यक चेहरे के तौर पर भाजपा का मजबूत विकल्प।
- मोहम्मद आरिफ खान – वर्तमान में बिहार के राज्यपाल। भाजपा को मुस्लिम चेहरा भी मिल सकता है।
- नीतीश कुमार – हालांकि कुछ समय के लिए उनका नाम चर्चा में था, लेकिन जेडीयू नेताओं ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है।
एनडीए के पास बहुमत का आंकड़ा
गौरतलब है कि एनडीए के पास संसद के दोनों सदनों में कुल 422 सांसद हैं, जबकि उपराष्ट्रपति बनने के लिए 394 वोटों की आवश्यकता होती है। यानी एनडीए के लिए यह चुनाव एकतरफा जीत जैसा है। फिर भी सरकार चाहती है कि सर्वसम्मति से कोई उम्मीदवार चुना जाए, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल पेश की जा सके।
26 जुलाई के बाद हो सकता है फैसला
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, 26 जुलाई के बाद उम्मीदवार के नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है। सत्तारूढ़ गठबंधन इस बार किसी ऐसे नेता को चुनना चाहता है जो सामाजिक और राजनीतिक रूप से संतुलन बनाए रख सके।
हरिवंश नारायण सिंह कौन हैं?
हरिवंश नारायण सिंह का जन्म 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिताबदियारा गांव में हुआ था। यह वही गांव है जहां से लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी ताल्लुक रखते थे। उनके पिता बांके बिहारी सिंह गांव के प्रधान थे और अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे, जिनका असर हरिवंश के जीवन पर साफ झलकता है।
उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। हरिवंश का पत्रकारिता करियर टाइम्स ऑफ इंडिया से ट्रेनी के तौर पर शुरू हुआ। इसके बाद वह ‘धर्मयुग’ और ‘रविवार’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से जुड़े रहे। बिहार और झारखंड में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए उन्हें जाना गया।
ईमानदार पत्रकारिता के प्रतीक बने
1989 में उन्होंने ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक का पद संभाला और इस अखबार को सच्चाई की आवाज बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1990 में वह प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सूचना सलाहकार बने, लेकिन उनके पद छोड़ते ही हरिवंश ने इस्तीफा देकर दोबारा पत्रकारिता में वापसी की।
अप्रैल 2014 में उन्हें जनता दल (यू) से राज्यसभा भेजा गया और 2018 में वह पहली बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए। सितंबर 2020 में उन्हें दोबारा इसी पद के लिए चुना गया। वह दो बार उपसभापति बनने वाले पहले गैर-कांग्रेसी नेता हैं।
मिले कई पुरस्कार
हरिवंश को 1996 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान, 2008 में माधवराव सप्रे सम्मान और 2012 में विश्व हिंदी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग) में हिंदी सेवा के लिए सम्मान मिला। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं हैं, जिनमें मेरी जेल डायरी, चंद्रशेखर संवाद शृंखला और चंद्रशेखर: द लास्ट आइकॉन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स प्रमुख हैं।
निष्कर्ष
देश के अगले उपराष्ट्रपति पद को लेकर सस्पेंस बना हुआ है, लेकिन तमाम राजनीतिक और सामाजिक संकेतों से लगता है कि हरिवंश नारायण सिंह इस रेस में सबसे मजबूत दावेदार हैं। हालांकि, अंतिम फैसला 26 जुलाई के बाद होगा, लेकिन यह तय है कि अगला उपराष्ट्रपति सामाजिक और सियासी संतुलन का चेहरा होगा।