Agency , आर्थिक संकट से बुरी तरह जूझ रहा पाकिस्तान Pakistan Economic Crisis अब फिर से एक नए देश के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस बार मलेशिया पहुंचे हैं, जहां उन्होंने मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से मुलाकात कर निवेश और साझेदारी की नई कहानी सुनाई है। दो दिवसीय यात्रा (6 से 7 अक्टूबर 2025) के दौरान दोनों नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसी दौरान शहबाज शरीफ ने कहा –
“अभी पाकिस्तान को IMF की जरूरत है, लेकिन अगर मलेशिया साथ दे, तो हम IMF से हमेशा के लिए मुक्त हो सकते हैं।”
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यह बयान ऐसे वक्त आया है जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा है, महंगाई ऐतिहासिक स्तर पर है और बेरोजगारी ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है। IMF से मिल रही मदद भी अब किसी स्थायी राहत की तरह काम नहीं कर रही, इसलिए शरीफ सरकार अब नई चाल चल रही है — दोस्ती की आड़ में आर्थिक कटोरा फैलाने की। Pakistan Economic Crisis
मलेशिया से साझेदारी की अपील – “दोस्ती में निवेश का भरोसा”
कुआलालंपुर में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शाहबाज शरीफ ने मलेशिया के सामने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को खुलकर रखा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए इस वक्त IMF कार्यक्रम जरूरी है, लेकिन अब देश को बाहरी वित्तीय निर्भरता से मुक्त होना चाहिए। Pakistan Economic Crisis
शरीफ ने कहा –
“पाकिस्तान और मलेशिया के उद्यमियों को साथ आकर संयुक्त निवेश (Joint Investment) करना चाहिए। अगर यह हुआ, तो हम IMF को हमेशा के लिए अलविदा कह सकेंगे।”
दरअसल, शरीफ का मकसद मलेशिया से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) हासिल करना है। उन्होंने खास तौर पर टेक्नोलॉजी, ऊर्जा और कृषि क्षेत्र में साझेदारी का आग्रह किया है। पाकिस्तान चाह रहा है कि मलेशिया उसकी औद्योगिक इकाइयों में पूंजी लगाए, ताकि नए रोजगार पैदा हों और अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सके। Pakistan Economic Crisis
आर्थिक बदहाली के पीछे की सच्चाई – “सिर्फ कूटनीति नहीं, मजबूरी भी”
पाकिस्तान के लिए यह कोई नई स्थिति नहीं है। पिछले कुछ सालों से देश की वित्तीय हालत लगातार गिरती जा रही है। ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा झटका लगा। भारत ने जब PoK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) में आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की, तो इसके बाद पाकिस्तान की छवि आतंकवाद समर्थक देश के रूप में और गहरी हो गई। Pakistan Economic Crisis
इससे विदेशी निवेशक डर गए और पाकिस्तान के अंदर पूंजी का प्रवाह लगभग रुक गया।
IMF से मिली मदद ने कुछ समय के लिए राहत दी, लेकिन इसके साथ सख्त शर्तें भी जुड़ी रहीं — जैसे टैक्स बढ़ाना, सब्सिडी घटाना और आयात नियंत्रण। इन शर्तों ने आम पाकिस्तानी नागरिक की जेब पर भारी बोझ डाल दिया है।
IMF से मिली मदद भी नाकाफी साबित
मई 2025 में IMF ने पाकिस्तान को लगभग 8,000 करोड़ रुपए (करीब 1 अरब डॉलर) की आर्थिक सहायता दी थी। यह बेलआउट पैकेज कुछ समय के लिए पाकिस्तान की सांसें चलाए रखने में मददगार साबित हुआ, लेकिन देश के बुनियादी आर्थिक ढांचे में कोई बड़ा सुधार नहीं आया। Pakistan Economic Crisis
भारत ने इस सहायता का विरोध करते हुए कहा था कि IMF को ऐसे देश को मदद नहीं देनी चाहिए जो आतंकवाद को बढ़ावा देता है। लेकिन IMF ने अंतरराष्ट्रीय दबाव और भू-राजनीतिक कारणों के चलते मदद मंजूर की।
अब जब वह रकम भी खर्च हो चुकी है, पाकिस्तान के पास फिर से वही पुरानी स्थिति है — “कैसे और कहाँ से पैसे जुटाए जाएँ।”
सेना की जकड़ में फंसी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान में सरकारें तो आती-जाती रहती हैं, लेकिन असली ताकत हमेशा सेना के पास रही है। देश का बड़ा हिस्सा रक्षा बजट में खर्च होता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। Pakistan Economic Crisis
रक्षा खर्च के साथ-साथ आतंकवादी संगठनों को फंडिंग और भ्रष्टाचार ने अर्थव्यवस्था को खोखला बना दिया है। IMF के साथ हुए 7 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की दूसरी समीक्षा में पाकिस्तान पाँच में से तीन लक्ष्यों को पूरा करने में नाकाम रहा। इसका सीधा मतलब है कि पाक सरकार आर्थिक सुधारों से ज्यादा राजनीतिक फायदे को प्राथमिकता दे रही है।
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विशेषज्ञों का तंज – “दोस्ती की आड़ में फिर फैला कटोरा”
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि शरीफ का यह मलेशिया दौरा “कूटनीति से ज्यादा भीख मांगने” की कोशिश जैसा है। Pakistan Economic Crisis
पूर्व अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. नसीर अहमद कहते हैं –
“हर बार पाकिस्तान एक नया दोस्त ढूंढता है, लेकिन अपनी आर्थिक नीतियों में कोई बदलाव नहीं लाता। जब तक वित्तीय पारदर्शिता और स्थिरता नहीं होगी, तब तक IMF से छुटकारा मिलना मुश्किल है।” Pakistan Economic Crisis
वहीं, कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि शरीफ की यह रणनीति अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छवि सुधारने का प्रयास है। IMF से बार-बार सहायता मांगने के कारण पाकिस्तान की छवि “कर्ज पर जिंदा रहने वाले देश” की बन चुकी है। अब मलेशिया के सहारे वह यह दिखाना चाहता है कि उसके पास नए साझेदार हैं और वह खुद भी निवेश आकर्षित कर सकता है।
मलेशिया क्या करेगा मदद?
अब सवाल यह है कि क्या मलेशिया वाकई पाकिस्तान की मदद करेगा?
विश्लेषकों के मुताबिक, मलेशिया का खुद का आर्थिक ढांचा बहुत मजबूत नहीं है। हालांकि वह दक्षिण-पूर्व एशिया में एक स्थिर अर्थव्यवस्था मानी जाती है, लेकिन वह भी अपने निवेश को लेकर बेहद सतर्क रहता है। Pakistan Economic Crisis
अगर पाकिस्तान मलेशिया को ठोस आर्थिक प्रस्ताव देता है — जैसे औद्योगिक साझेदारी, निर्यात लाभ या रक्षा-तकनीकी सहयोग — तो संभव है कि मलेशिया कुछ सीमित निवेश करे। लेकिन व्यापक मदद या बेलआउट जैसा समर्थन मिलने की संभावना बेहद कम है।
“IMF से मुक्त होना सपना ही रहेगा”
शरीफ ने कहा है कि अगर मलेशिया मदद करे तो पाकिस्तान IMF से हमेशा के लिए मुक्त हो सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान की वित्तीय निर्भरता इतनी गहरी हो चुकी है कि एक या दो देशों की मदद से इससे छुटकारा पाना मुश्किल है।
जब तक पाकिस्तान अपनी घरेलू नीतियों — खासकर कर सुधार, निर्यात वृद्धि और भ्रष्टाचार नियंत्रण — पर ध्यान नहीं देता, तब तक कोई भी देश उसे स्थायी राहत नहीं दे सकता। IMF से दूरी बनाने की बात तो अच्छी लगती है, लेकिन इसके लिए आत्मनिर्भरता और स्थिर नीतियां जरूरी हैं, जो फिलहाल पाकिस्तान में नजर नहीं आतीं।
“कूटनीति के नाम पर आर्थिक मजबूरी”
मलेशिया के साथ शाहबाज शरीफ की बातचीत फिलहाल पाकिस्तान के लिए केवल उम्मीद की किरण है, वास्तविक राहत नहीं। पाकिस्तान की आर्थिक नीतियां बार-बार असफल साबित हुई हैं और सेना का हस्तक्षेप इसे और जटिल बना रहा है। Pakistan Economic Crisis
अगर शरीफ सरकार वास्तव में IMF से मुक्त होना चाहती है, तो उसे पहले अपने घर को दुरुस्त करना होगा। वरना चाहे चीन हो, सऊदी अरब या अब मलेशिया — हर जगह “दोस्ती की कहानी” सुनाते-सुनाते पाकिस्तान को बस निराशा ही मिलेगी। Pakistan Economic Crisis