CGNEWS क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी खेती भी है जिसे एक बार लगाने के बाद आप 30 साल तक लगातार कमाई कर सकते हैं? जी हाँ, हम बात कर रहे हैं ऑयल पाम की खेती की। छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए पॉम की खेती एक नया और स्थायी आय का साधन बन रही है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों मिलकर इस खेती को बढ़ावा दे रही हैं, ताकि किसान अपनी आय बढ़ा सकें और देश की खाद्य तेलों पर निर्भरता भी कम हो सके। (Farmers in Chhattisgarh are becoming self-reliant through palm cultivation, know how Palm cultivation in Chhattisgarh: A source of permanent income for farmers)
क्यों खास है पॉम की खेती?
बंपर कमाई: पॉम की खेती से प्रति हेक्टेयर हर साल ₹2.5 लाख से ₹3 लाख तक की शानदार कमाई की जा सकती है।
लंबी अवधि का उत्पादन: एक बार पौधे लगाने के बाद, तीसरे साल से लेकर 30 साल तक लगातार फल मिलते हैं।
सरकारी मदद: केंद्र और राज्य सरकार, दोनों की तरफ से कुल ₹2 लाख का अनुदान मिलता है।
निशुल्क तकनीकी सहायता: उद्यान विभाग किसानों को पॉम की खेती के लिए ज़रूरी तकनीकी जानकारी और ट्रेनिंग मुफ्त में देता है।
सरकार का साथ, किसानों का विकास
राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पाम मिशन के तहत केंद्र और राज्य सरकार मिलकर किसानों को पॉम की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। इस मिशन का मुख्य लक्ष्य देश को खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर बनाना और किसानों की आमदनी को बढ़ाना है। अब तक, पूरे देश में 3.5 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर पॉम की खेती सफलतापूर्वक की जा चुकी है।
छत्तीसगढ़ में भी यह मिशन ज़ोरों पर है। अब तक राज्य में 2,682 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर पॉम के पौधे लगाए जा चुके हैं। सरकार ने 2029-30 तक पॉम ऑयल का उत्पादन 28 लाख टन तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है।
छत्तीसगढ़ के 17 ज़िलों में हो रही पॉम की खेती
छत्तीसगढ़ सरकार, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और कृषि मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन में किसानों की आय बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। राज्य के 17 ज़िलों में पॉम की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिनमें मुख्य रूप से बस्तर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, महासमुंद, रायगढ़, सारंगढ़-बिलाईगढ़, जांजगीर-चांपा, दुर्ग, बेमेतरा, जशपुर, सरगुजा, कोरबा और बिलासपुर शामिल हैं।
पिछले चार सालों में 1,150 से ज़्यादा किसानों ने लगभग 1,600 हेक्टेयर में पॉम के पौधे लगाए हैं। इस साल भी 802 किसानों ने 1,089 हेक्टेयर में पॉम का रोपण किया है, जिससे साफ पता चलता है कि किसान इस खेती को लेकर कितने उत्साहित हैं।
सफल किसान की कहानी: राजेंद्र मेहर
रायगढ़ के चक्रधरपुर गाँव के किसान श्री राजेंद्र मेहर इसकी एक जीती-जागती मिसाल हैं। उनकी 10 एकड़ ज़मीन लंबे समय से खाली पड़ी थी। उद्यान विभाग के संपर्क में आने के बाद उन्हें न सिर्फ सही जानकारी मिली, बल्कि पॉम की खेती के फायदों के बारे में भी पता चला। इससे प्रेरित होकर उन्होंने 570 पॉम के पौधे लगाए हैं। अब वे उम्मीद कर रहे हैं कि यह खेती उनकी आय का एक बड़ा ज़रिया बनेगी।
इसी तरह, महासमुंद ज़िले में भी 611 हेक्टेयर ज़मीन पर पॉम की खेती हो रही है, जिससे सैकड़ों किसानों को फायदा हो रहा है।
खेती के लिए मिलती है भरपूर मदद
पॉम की खेती शुरू करने के लिए सरकार किसानों को कई तरह की सहायता देती है:
निःशुल्क पौधे: प्रति हेक्टेयर ₹29,000 की कीमत के 143 पौधे मुफ्त दिए जाते हैं।
अनुदान: खेती की कुल लागत (लगभग ₹4 लाख प्रति हेक्टेयर) में से केंद्र और राज्य सरकार की ओर से कुल ₹2 लाख का अनुदान मिलता है।
लोन की सुविधा: बची हुई राशि के लिए बैंक से लोन भी आसानी से मिल जाता है।
अन्य सुविधाएं: ड्रिप इरिगेशन, बोरवेल, पम्प सेट, वर्मी कंपोस्ट यूनिट और खेती के लिए ज़रूरी उपकरण जैसे पॉम कटर आदि के लिए भी अनुदान का प्रावधान है।
कमाई की गारंटी: समर्थन मूल्य पर खरीद
पॉम की खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको अपनी फसल बेचने की चिंता नहीं करनी पड़ती। सरकार ने अनुबंधित कंपनियों को नियुक्त किया है जो किसानों के खेत से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसल खरीदती हैं। फसल का पैसा सीधे किसान के बैंक खाते में जमा होता है।
इसके अलावा, किसान पॉम के पौधों के बीच खाली जगह में सब्ज़ियां या दूसरी अंतरवर्तीय फसलें भी उगा सकते हैं, जिससे उनकी आमदनी और बढ़ जाती है। इसके लिए भी सरकार सब्सिडी देती है। जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन है, उन्हें बोरवेल लगाने के लिए ₹50,000 का अतिरिक्त अनुदान भी मिलता है।
पॉम की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम है। यह खेती किसानों को न सिर्फ आर्थिक रूप से मज़बूत बना रही है, बल्कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रही है। (Palm cultivation in Chhattisgarh: A permanent source of income of ₹3 lakh per annum for farmers)