राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू केवल एक हिल स्टेशन ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक महत्व से भी भरपूर है। यहां स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर अपने आप में अनूठा है, क्योंकि यह दुनिया का इकलौता मंदिर है जहां भगवान शिव के पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है। यहां पर विराजमान शिवलिंग भगवान शिव के अंगूठे के रूप में पूजित है और इसकी खास बात यह है कि यह दिन में तीन बार रंग बदलता है। सावन मास और महाशिवरात्रि पर दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है।
अर्धकाशी: माउंट आबू का धार्मिक महत्व
अचलेश्वर महादेव मंदिर के कारण माउंट आबू को अर्धकाशी कहा जाता है। जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में वाराणसी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है, ठीक उसी तरह माउंट आबू को भगवान शिव की उपनगरी का दर्जा मिला हुआ है।
स्थानीय मान्यता है कि यह पूरा पर्वत भगवान शिव के अंगूठे पर टिका है। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह अंगूठा हट जाएगा, उस दिन यह पर्वत धराशायी हो जाएगा।
ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि
मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी में परमार वंश द्वारा करवाया गया था और 1452 ई. में महाराणा कुंभा ने इसका पुनर्निर्माण कर इसे “अचलगढ़” नाम दिया।
पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि वशिष्ठ की गाय कामधेनु जब ब्रह्म खाई में गिर गई तो उन्होंने गंगा और सरस्वती नदियों को आह्वान कर खाई को जल से भरवाया। बाद में उन्होंने हिमालय से इस खाई को स्थायी रूप से भरवाने की प्रार्थना की। हिमालय ने अपने पुत्र नंदी वद्रधन को भेजा जिसे अर्बुद नाग ने उड़ाकर वशिष्ठ के पास लाया। नंदी वद्रधन ने इस स्थान को पर्वत रूप में स्थिर किया, और इसे ‘आबू पर्वत’ कहा गया। हालांकि पर्वत फिर भी स्थिर नहीं हो पा रहा था। तब भगवान शिव ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे से इसे स्थिर कर “अचल” बना दिया, और तभी से यह स्थान “अचलेश्वर महादेव” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
रहस्यमयी विशेषताएं
तीन बार रंग बदलता अंगूठा रूपी शिवलिंग: यह अंगूठा रूपी शिवलिंग दिन में तीन बार—सुबह, दोपहर और शाम को—अपना रंग बदलता है, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाता है।
पाताल खड्डा: मंदिर में अंगूठे के नीचे एक प्राकृतिक खड्डा है जिसमें कितना भी पानी डाला जाए, वह कभी नहीं भरता। यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है।
“मंदिर में विराजमान नंदी की प्रतिमा पांच धातुओं—सोना, चांदी, तांबा, कांसा और जस्ता—से निर्मित है, जिसका वजन करीब 4 टन है। मान्यता है कि इसी नंदी ने कई बार विदेशी आक्रमणों से मंदिर की रक्षा की थी।”
मंदिर परिसर की खास बातें
धर्मकांटा: मंदिर में एक ऐतिहासिक धर्मकांटा है, जहां पुराने समय में राजा अचलेश्वर की शपथ लेकर न्याय करते थे।
चंपा का वृक्ष: मंदिर परिसर में एक विशाल चंपा का वृक्ष है जो कई धार्मिक आयोजनों का साक्षी है।
द्वारकाधीश मंदिर: अचलेश्वर परिसर में ही स्थित यह मंदिर दर्शनीय है।
दशावतार प्रतिमाएं: मंदिर के गर्भगृह के बाहर भगवान विष्णु के दस अवतारों की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं।
भैंसों की मूर्तियां: मंदिर के पीछे तीन पत्थर की बनी भैंसों की मूर्तियां हैं, जो अनोखी शिल्पकला का उदाहरण हैं।
कैसे पहुंचे अचलेश्वर महादेव मंदिर?
सड़क मार्ग:
माउंट आबू राजस्थान के सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। निजी वाहन और बसों की सुविधा उपलब्ध है।
रेल मार्ग:
आबू रोड यहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है, जो लगभग 28 किमी दूर स्थित है।
हवाई मार्ग:
उदयपुर का महाराणा प्रताप एयरपोर्ट यहां का नजदीकी हवाई अड्डा है, जो करीब 207 किमी दूर स्थित है।
निष्कर्ष
अचलेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, रहस्य और वास्तुकला का अद्भुत संगम है। श्रावण मास में यहां दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। शिवभक्तों के लिए यह मंदिर किसी तीर्थ से कम नहीं। जो भी यहां आता है, वह भोलेनाथ के इस दिव्य रूप के दर्शन कर धन्य हो जाता है।