रायसेन (मध्य प्रदेश)। देश में मंदिरों की कोई कमी नहीं, लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जो साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही खुलता है? भोलेनाथ को न जाने किस बात की सज़ा मिल रही है कि वो साल भर लोहे के भारी भरकम ताले में बंद रहते हैं और उनके भक्त सिर्फ महाशिवरात्रि के दिन ही उनके दर्शन कर पाते हैं। हम बात कर रहे हैं रायसेन जिले में स्थित किले की पहाड़ी पर बने प्राचीन सोमेश्वर महादेव मंदिर की, जहां ताले साल में सिर्फ एक बार खोले जाते हैं।
सोने सी चमक लिए मंदिर, लेकिन ताले में कैद भगवान!
12वीं सदी में बना यह मंदिर रायसेन शहर के ऐतिहासिक किले की पहाड़ी पर स्थित है। जैसे ही सुबह उगते सूर्य की पहली किरण इस मंदिर पर पड़ती है, तो पूरा मंदिर मानो सोने की तरह चमक उठता है। लेकिन यह सौंदर्य साल में केवल एक दिन के लिए ही नजर आता है। बाकी पूरे साल यहां ताले जड़े रहते हैं। भक्त सिर्फ दूर से झांकते हैं, मन्नतें मांगते हैं और दरवाजे पर रंगीन कपड़े, धागे या पन्नियां बांधकर चले जाते हैं।
आज़ादी के बाद मंदिर में लगा ताला
स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ सालों बाद रायसेन किले पर स्थित इस मंदिर और पास की मस्जिद को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इस विवाद को शांत करने के उद्देश्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस ऐतिहासिक मंदिर में ताले डाल दिए और आम जनता का प्रवेश वर्जित कर दिया गया।
इस दौरान 1974 तक कोई भी व्यक्ति मंदिर के भीतर पूजा-अर्चना नहीं कर पाया। लोगों की श्रद्धा, आस्था और भावनाओं को ठेस पहुंची, लेकिन भक्तों ने हार नहीं मानी।
जब शुरू हुआ मंदिर ताले खोलने का आंदोलन
1974 में रायसेन नगर के हिंदू समाज और विभिन्न संगठनों ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। मंदिर के ताले खोलने के लिए एक बड़ा जन आंदोलन शुरू किया गया। इसके दबाव में आकर तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी खुद मंदिर स्थल पर पहुंचे और महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के ताले खुलवाए।
इसी दिन मंदिर परिसर में विशाल मेले का आयोजन भी किया गया। तब से परंपरा बन गई कि साल में एक बार केवल महाशिवरात्रि के दिन ही मंदिर के ताले खोले जाते हैं। आज भी यह परंपरा बरकरार है।
भक्तों की आस्था और पीड़ा
हर साल महाशिवरात्रि पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए किले की ऊंची पहाड़ी पर चढ़ाई करनी पड़ती है, लेकिन भक्तों के जोश में कोई कमी नहीं होती। श्रद्धालु अभिषेक, पूजन, भजन और कीर्तन के साथ भोलेनाथ का दर्शन करते हैं।
मुंशीलाल, जो कि रायसेन के स्थानीय जानकार हैं, बताते हैं कि इस मंदिर की मान्यता बेहद प्राचीन है और यहां हर साल हजारों की संख्या में शिवभक्त उमड़ते हैं। मंदिर की ऊर्जा और आस्था आज भी लोगों के दिलों में बसी है।
उमा भारती ने भी उठाई थी आवाज़
2022 में मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी मंदिर के ताले खोलने की मांग की थी। उन्होंने यहां आकर अनशन पर बैठने का ऐलान किया था, लेकिन प्रशासन द्वारा आश्वासन दिए जाने पर उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया। बावजूद इसके, आज तक मंदिर के ताले नियमित पूजा के लिए नहीं खोले गए।
भक्त ताले पर ही करते हैं अभिषेक
पूरे साल मंदिर में ताला लगा रहता है, लेकिन आस्था के आगे कोई बंदिश टिक नहीं पाती। भक्त लोहे के दरवाजे के बाहर ही अभिषेक करते हैं। रंगीन धागे, पन्नियां, कपड़े बांधकर मन्नत मांगते हैं। दरवाजे पर अक्सर जल चढ़ाते हुए लोग देखे जाते हैं।
पुरातत्व विभाग से उम्मीद
श्रद्धालु बार-बार पुरातत्व विभाग से मांग कर चुके हैं कि मंदिर के ताले खोल दिए जाएं। लोग चाहते हैं कि उन्हें साल भर भगवान शिव के दर्शन और पूजा का अवसर मिले। एक धार्मिक स्थल को यूं बंद रखना आस्था के अधिकार के खिलाफ है।
निष्कर्ष
रायसेन का सोमेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि लाखों शिव भक्तों की आस्था का प्रतीक है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी भोलेनाथ एक ताले में बंद हैं। सरकार और पुरातत्व विभाग को चाहिए कि आस्था को सम्मान दे और मंदिर को भक्तों के लिए हर दिन खोला जाए।