सिलवानी, अक्सर हम छोटी-छोटी बातों की चिंता में खुद को इतना उलझा लेते हैं कि जिंदगी का सुकून ही छिन जाता है। लेकिन, मुनि साक्ष्य सागर महाराज कहते हैं कि चिंता नहीं, चिंतन करना चाहिए। चिंता तो बस चिता की तरफ ले जाती है, जबकि चिंतन हमें समस्याओं का हल देता है और जिंदगी की मुश्किलों का सामना करने की ताकत देता है। ये बातें उन्होंने सोमवार को सिलवानी के पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में कही, जहां इन दिनों मुनि साक्ष्य सागर और मुनि निवृत्त सागर का चातुर्मास चल रहा है और वे रोज समाज को अनमोल ज्ञान दे रहे हैं।
मोबाइल: आज की सबसे बड़ी चुनौती!
मुनि साक्ष्य सागर महाराज ने आज के दौर की एक सबसे बड़ी समस्या पर सबका ध्यान खींचा – मोबाइल! उन्होंने साफ कहा कि मोबाइल आज एक विकट समस्या बनता जा रहा है। इसका बेतहाशा इस्तेमाल हमारे शरीर पर बुरा असर डाल रहा है। आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, लोगों की पीठ झुकने लगी है और समय से पहले ही बुढ़ापा नजर आने लगा है। मुनि श्री ने जोर देकर कहा कि मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ जरूरी कामों के लिए ही करें, न कि टाइमपास के लिए। सोचिए, हम कितने घंटे बस रील्स स्क्रॉल करने या बेवजह की चीजें देखने में गंवा देते हैं!
मन को काबू में रखें, तभी मिलेगी शांति
मुनिराज ने एक और गहरी बात कही: “जैसा परिणाम, वैसे भाव।” उन्होंने समझाया कि इंसान को अपने चंचल मन को काबू में रखना चाहिए। हमारे मन के परिणाम (विचार) जैसे होंगे, हमें वैसे ही नतीजे मिलेंगे। इन परिणामों से ही हमारे भाव (भावनाएं) बनते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा सुख मानसिक शांति है। जो व्यक्ति क्लेश या अशांति में डूबा रहता है, वह कभी शांति का अनुभव नहीं कर सकता। किसी भी समस्या का समाधान तभी हो सकता है, जब हम एकाग्र मन से उस पर विचार करें। उन्होंने यह भी कहा कि किसी को देखकर अपनी भाव विशुद्धि (विचारों की पवित्रता) खराब नहीं करनी चाहिए। जब हम दूसरों से ईर्ष्या या द्वेष करते हैं, तो खुद का ही नुकसान करते हैं। अपने विचारों को शुद्ध रखना ही असली सुख का मार्ग है।
धर्म संसार से ऊपर: वर्तमान में जीना सीखें
मुनि साक्ष्य सागर महाराज ने समझाया कि धर्म संसार से ऊपर है। हमें कल क्या होगा, इसकी चिंता छोड़कर आज को जीना चाहिए। हम अक्सर अपने भविष्य के डर में वर्तमान के सुख को गंवा देते हैं। हमारे पास सब कुछ होता है, फिर भी हम उसका आनंद नहीं ले पाते। हर इंसान किसी न किसी भय से ग्रस्त है – चाहे वह लोक का भय हो या परलोक का। “लोग क्या कहेंगे?” इसी डर से हम अक्सर गलतियां करते हैं। ज्ञानी व्यक्ति भी जब गलती करता है, तो उसे अपनी गलती का उतना डर नहीं होता, जितना इस बात का कि लोग क्या सोचेंगे। ऐसा व्यक्ति कभी सच्चा धर्मात्मा नहीं हो सकता, क्योंकि वह दूसरों के डर में बंधा है, न कि अपने धर्म पर अडिग है।
मनुष्य में अनंत ज्ञान का भंडार: मुनि निवृत्त सागर महाराज
मुनि निवृत्त सागर महाराज ने अपनी प्रवचनमाला में कहा कि भगवान ने हमें कल्याण का मार्ग दिखाया है और हमें उसी पर चलकर आगे बढ़ना है। उन्होंने रोजाना यह भावना रखने की सलाह दी कि जो भी मिथ्यात्व (गलत धारणाएं) हुआ है, वह खत्म हो जाए। उन्होंने चेताया कि जानबूझकर किया गया मिथ्यात्व हमें बुरे फल देता है। जहां मद (अहंकार) होता है, वहां अंधकार छा जाता है। उन्होंने मौसम के फल को औषधि के समान बताया, जो समय पर ही फायदा देता है। इंसान जानता है कि अमृत पीने से अमर हो जाएगा और विष पीने से मौत आएगी, फिर भी वह गलत रास्ते चुनता है और मिथ्यात्व में पड़ा रहता है। मुनि श्री ने जोर दिया कि मनुष्य में अनंत ज्ञान का भंडार है। हमें अपने जैन कुल की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए और सम्यकत्व रूपी औषधि का रसपान करना चाहिए।
उन्होंने आखिर में कहा कि धर्म ही वह शरण है, जो इंसान को संसार के भ्रम से निकालकर सम्यक दर्शन की ओर ले जाती है। उन्होंने अरहंत, सिद्ध, साधु और जिन धर्म को चार वास्तविक शरण बताया। उनका कहना था कि जब तक हम जमीन से जुड़े रहेंगे, तभी हमें सफलता और जीवन का सार मिलेगा। हमारी सांसें सीमित हैं और हर पल हमारी आयु कम हो रही है। इसलिए, हमें अपने समय का सदुपयोग करके धर्म में स्थिरता लानी चाहिए