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कर्तव्य, कर्म और अहंकार से मुक्ति की सीख देते भगवान श्रीकृष्ण – पंडित मोहनलाल द्विवेदी

मैहर के सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. मोहनलाल द्विवेदी ने गीता के माध्यम से बताया कि कर्म करते समय कर्ता भाव नहीं, निमित्त भाव रखें। जानिए इसका जीवन में क्या महत्व है।

On: July 19, 2025 3:37 PM
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मैहरमां शारदा देवी धाम, मैहर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित मोहनलाल द्विवेदी जी ने श्रीमद्भगवद्गीता के एक महत्वपूर्ण श्लोक की व्याख्या करते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन का सबसे गहरा सूत्र दिया – “कर्तव्य भाव से कर्म करो, लेकिन खुद को कर्ता मत मानो।”

उन्होंने बताया कि जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन शस्त्र छोड़कर बैठ गया और अपने सगे-संबंधियों से युद्ध करने से मना करने लगा, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे जीवन की वह सीख दी जो आज भी हर इंसान के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है।

कर्तव्य और निमित्त में अंतर
पंडित द्विवेदी जी ने इस भेद को स्पष्ट करते हुए कहा कि, कल्पना कीजिए एक भवन निर्माता एक इंजीनियर द्वारा बनाए गए नक्शे का उपयोग करके एक इमारत खड़ी करता है. अगर इमारत ढह जाती है, तो किसे जवाबदेह ठहराया जाएगा? नक्शे को या जिसने इमारत बनाई उसे? स्पष्ट है कि जिम्मेदार ठहराया जाएगा उस भवन निर्माता को जिसने इमारत बनाई, क्योंकि नक्शा तो केवल एक माध्यम (निमित्त) था. भवन निर्माता का कर्तव्य था कि वह सुरक्षित रूप से इमारत का निर्माण करे, और उसी ने उस कर्तव्य का पालन किया.कर्तव्य और निमित्त का फर्क

कर्म करते हुए अहंकार से कैसे बचें?

इस शिक्षाप्रद संवाद में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि यदि हम किसी काम को करते हुए यह समझें कि “मैं ही सबकुछ कर रहा हूं”, तो उसी क्षण अहंकार उत्पन्न होता है और वही अहंकार हमें कर्म के फल में बाँध देता है – अच्छा या बुरा।

लेकिन अगर हम यह मान लें कि हम तो बस ईश्वर के हाथों की कठपुतली हैं, हम तो एक निमित्त हैं – तो फिर कर्म करने के बाद भी उसका फल हमें नहीं बांधता।

यही गीता का मर्म है – “कर्म करो, पर फल की चिंता मत करो।”

अर्जुन ने कैसे प्राप्त की आत्मदृष्टि

जब अर्जुन को भगवान की यह बात समझ में आई, जब उसे यह दृष्टि मिली कि वह केवल निमित्त है और युद्ध उसका कर्तव्य है, तब उसने बिना किसी मोह के अपने धनुष को उठाया और धर्म युद्ध में कूद पड़ा।

पंडित मोहनलाल द्विवेदी जी कहते हैं कि यही दृष्टि आज के युग में हर व्यक्ति को प्राप्त करनी चाहिए। चाहे हम नौकरी करें, व्यापार करें, सेवा करें या समाज के लिए कुछ करें – यदि हम हर कार्य को निष्काम भाव से करें, खुद को कर्ता न मानें, तो जीवन में शांति और सफलता दोनो मिलेगी।

जीवन का सार – निष्काम कर्म

यह संदेश सिर्फ अर्जुन के लिए नहीं था, बल्कि हम सबके लिए है। आज के समय में जब हर कोई अपने लाभ, यश और पहचान की दौड़ में भाग रहा है, तब गीता का यह संदेश हमें भीतर से मजबूत बनाता है – कर्म करें, लेकिन उसमें अहंकार और स्वार्थ का भाव न रखें।

पंडित द्विवेदी जी ने कहा – “जब हम कर्ता बनते हैं, तब कर्म हमें बांधता है। लेकिन जब हम निमित्त बनते हैं, तब हम मुक्त होते हैं। यही जीवन की सच्ची साधना है।”

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