एक नई शुरुआत, एक पुरानी याद और बच्चों के साथ ढेर सारी खुशियाँ! ये कहानी है दंतेवाड़ा के नए संयुक्त संचालक शिक्षा, राकेश पांडेय की, जिन्होंने अपने ऑफ़िस की कुर्सी संभालने से पहले एक ऐसा काम किया जिसने सबका दिल जीत लिया. उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत कहीं और से नहीं, बल्कि उसी स्कूल से की जहाँ से उन्होंने खुद अपनी शुरुआती पढ़ाई की थी— जी हाँ, प्राथमिक शाला जमावड़ा, संकुल धु्रली, जिला दंतेवाड़ा.
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अपने बचपन के स्कूल में ‘वापसी’
ये सिर्फ एक सरकारी दौरा नहीं था, ये तो एक बेटे की अपने पिता की कर्मभूमि और अपने बचपन की दहलीज पर वापसी थी. राकेश पांडेय के पिता, स्वर्गीय श्रीमान् पांडेय जी, इसी स्कूल में प्रधान पाठक (हेडमास्टर) थे. सोचिए, जब राकेश पांडेय उस स्कूल के गलियारों से गुज़रे होंगे, उन कमरों में झाँका होगा जहाँ उन्होंने कभी अक्षर ज्ञान सीखा था, तो कितनी यादें ताज़ा हुई होंगी!
निरीक्षण के दौरान उन्होंने सिर्फ़ स्कूल की व्यवस्थाएँ ही नहीं देखीं, बल्कि अपने बचपन की यादों में भी खो गए. वो उन बेंचों को छूकर महसूस कर रहे होंगे जहाँ कभी वो खुद बैठा करते थे, उस आँगन में चल रहे होंगे जहाँ कभी दोस्तों के साथ खेलते थे. ये सब कुछ उनके लिए एक आत्मीय अनुभव था.
बच्चों के साथ ज़मीन पर बैठकर खाया खाना, बाँटी चॉकलेट!
निरीक्षण के बाद राकेश पांडेय ने जो किया, वो सच में काबिले तारीफ़ है. वे किसी बड़े अफ़सर की तरह अपनी कुर्सी पर नहीं बैठे, बल्कि बच्चों के साथ ज़मीन पर बैठकर उन्होंने मध्याह्न भोजन किया. ये नज़ारा देखकर बच्चे भी हैरान थे और खुश भी.
खाने के बाद उन्होंने बच्चों से खूब बातें की, सवाल-जवाब किए. जब बच्चों ने सही जवाब दिए तो राकेश सर इतने खुश हुए कि उन्होंने झट से चॉकलेट निकालकर बाँट दी और उनका हौसला बढ़ाया. ये छोटी सी बात बच्चों के मन में हमेशा के लिए बैठ जाएगी. एक बड़े अफ़सर को अपने साथ ज़मीन पर बैठा देखकर, अपनी बातें सुनते और चॉकलेट देते देखकर बच्चों को कितनी खुशी मिली होगी, इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं है.
शिक्षकों की सराहना: ‘ज़मीनी हकीकत से जुड़ना ज़रूरी’
राकेश पांडेय ने इस दौरान शिक्षकों की मेहनत और लगन की भी दिल खोलकर तारीफ़ की. उन्होंने कहा,
“शिक्षा व्यवस्था की मजबूती तभी संभव है जब अधिकारी जमीनी हकीकत से जुड़े रहें. यह विद्यालय मेरे जीवन की नींव रहा है — यहाँ लौटना मेरे लिए केवल औपचारिकता नहीं, एक आत्मीय अनुभव है.”
जब अफ़सर दिल से जुड़ते हैं, तब आता है असली बदलाव!
उनकी ये बात दिल को छू लेने वाली है. ये सच है कि जब अधिकारी सिर्फ़ फ़ाइलों में उलझने की बजाय ज़मीन पर उतरकर हकीकत देखते हैं, शिक्षकों और बच्चों से सीधे मिलते-जुलते हैं, तभी असली सुधार आता है. राकेश पांडेय का ये दौरा महज़ एक सरकारी काम नहीं था, बल्कि एक ऐसी मिसाल थी जो दिखाती है कि अगर नेतृत्व में अपनापन और जुड़ाव हो, तो शिक्षा के क्षेत्र में बड़े और बेहतरीन बदलाव लाना नामुमकिन नहीं.
यह घटना दंतेवाड़ा ही नहीं, बल्कि पूरे बस्तर संभाग के लिए एक मिसाल है. यह दिखाता है कि शिक्षा सिर्फ़ किताबों और नंबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ये भावनाओं, रिश्तों और अपनेपन से भी जुड़ी हुई है. उम्मीद है कि राकेश पांडेय की ये शुरुआत शिक्षा के क्षेत्र में और भी कई अच्छे बदलाव लाएगी और बच्चों का भविष्य और भी उज्ज्वल बनाएगी.