सिलवानी। गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष में सेठ अमरचंद समैया शासकीय सांदीपनि विद्यालय, सिलवानी में एक भावनात्मक और प्रेरणादायक व्यास पूजा कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम भारतीय शिक्षण मंडल, मध्य भारत प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ, जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को उजागर करते हुए संवाद एवं परिचर्चा का आयोजन भी हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस शुभारंभ के साथ विद्यालय परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। मुख्य वक्ता के रूप में ओमकार शर्मा ने शिरकत की और विद्यार्थियों को गुरु के महत्व के बारे में विस्तार से बताया।
मुख्य वक्ता ओमकार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि हमारे जीवन में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊँचा माना गया है। गुरु ही वह मार्गदर्शक होते हैं जो एक साधारण इंसान की सोच को इस हद तक जागरूक कर देते हैं कि वह अपने जीवन का सबसे ऊँचा लक्ष्य हासिल कर सकता है। उन्होंने कबीर के प्रसिद्ध दोहे “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय” का जिक्र करते हुए समझाया कि अगर जीवन में एक साथ गुरु और भगवान मिल जाएं, तो पहले गुरु को ही प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि वही हमें भगवान तक पहुँचने की राह दिखाते हैं।
उन्होंने चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य के उदाहरण से यह स्पष्ट किया कि एक सच्चा गुरु कैसे राष्ट्र और समाज को दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि जब भी समाज में अनीति और असत्य फैला है, तब शिक्षकों और गुरुओं ने ही नैतिकता की मशाल जलाकर रास्ता दिखाया है।
गुरु हमें इंसान बनाते हैं, सिर्फ पढ़ाते नहीं
मुख्य वक्ता ओमकार शर्मा ने विद्यार्थियों से भावुक अपील करते हुए कहा कि गुरु सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते, वे जीवन की राह दिखाते हैं। वे हमारे सोचने का तरीका बदलते हैं, हमें अच्छाई-बुराई की पहचान कराते हैं और हमारे अंदर अच्छे संस्कारों का निर्माण करते हैं। इसलिए हर विद्यार्थी को चाहिए कि वह अपने गुरुओं का दिल से आदर करे और उनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करे। तभी जीवन में असली सफलता और संतोष मिल सकता है।
कार्यक्रम में विद्यालय के प्राचार्य नर्मदा प्रसाद शिल्पी, शिक्षक मयंक रघुवंशी, नियम जैन, राजेंद्र विश्वकर्मा आदि ने भी विचार रखे और गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डाला। सभी ने एक स्वर में इस बात को दोहराया कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सबसे ऊँचा होता है और विद्यार्थियों को इस परंपरा को जीवित रखना चाहिए।
विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में उत्साह से भाग लिया और गुरु के प्रति अपने भाव प्रकट किए। कई विद्यार्थियों ने इस अवसर पर अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे उनके शिक्षक उनके जीवन में प्रेरणा का स्रोत रहे हैं।
गुरु पूर्णिमा – रिश्तों में श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक
इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक गहरी भावना है जो गुरु और शिष्य के अटूट रिश्ते को और भी प्रगाढ़ बनाती है। यह वह दिन है जब हम अपने जीवन के मार्गदर्शकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।