मध्य प्रदेश: सिलवानी में इन दिनों एक अजीबोगरीब मंज़र देखने को मिल रहा है. जहाँ एक तरफ प्रशासन ‘नशे से दूरी है ज़रूरी’ जैसा बड़ा अभियान चला रहा है, वहीं दूसरी तरफ नगर की सड़कों पर खुलेआम शराब पीते लोग दिख रहे हैं. ये नज़ारा इतना आम हो चुका है कि मुख्य बाज़ार और हाईवे के बीच तो बाकायदा ‘मदिरा पार्क’ जैसे हालात बन गए हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या ये अभियान सिर्फ दिखावा है, और कानून-व्यवस्था आखिर कहाँ है?
अहाते हुए बंद, पर ‘मदिरा पार्क’ खुलेआम!
आपको याद होगा, साल 2023 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई शराब नीति का ऐलान किया था, तो उन्होंने अहातों को बंद करने का आदेश दिया था. इसका सीधा मकसद था सार्वजनिक जगहों पर शराबखोरी रोकना और कानून-व्यवस्था सुधारना. सोचा गया था कि इससे सड़कों पर शराब पीने का चलन खत्म हो जाएगा.
लेकिन, अगर आप सिलवानी नगर की सड़कों पर निकलेंगे, तो देखेंगे कि यहाँ तो इस मकसद को खुलेआम धता बताया जा रहा है. लोग ठेलों के पास खड़े होकर, सरेआम सड़कों पर शराब पी रहे हैं. ये इलाका कोई छिपा हुआ नहीं है, बल्कि मुख्य बाज़ार और हाईवे के ठीक बीच में है. यहीं से बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारियों की गाड़ियाँ भी गुज़रती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किसी की नज़र इन पर पड़ती नहीं, या जानबूझकर इन सब को अनदेखा किया जा रहा है?
‘नशे से दूरी’ अभियान: सिर्फ़ दिखावा या हकीकत?
अभी 15 से 30 जुलाई तक जिला प्रशासन बड़े ज़ोर-शोर से ‘नशे से दूरी है ज़रूरी’ अभियान चला रहा है. टीवी और अख़बारों में इसकी तस्वीरें भी दिख रही हैं. लेकिन सिलवानी के स्थानीय लोगों का कहना है कि ये सब बस दिखावा है. उनका आरोप है कि पुलिस और प्रशासन सिर्फ़ गाँवों में या छोटे ढाबों पर छापे मारकर फ़ोटो खिंचवा रहे हैं. असली अव्यवस्था, जो नगर और हाईवे किनारे खुली आँखों से दिख रही है, वहाँ कोई कार्रवाई नहीं होती.
अगर अहाते बंद करना ही समाधान था, तो ठेके के ठीक बगल में चल रही इन ‘वैकल्पिक बैठकों’ पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? कानून-व्यवस्था के नाम पर की गई ये सारी कोशिशें क्या सच में सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित हैं? ये सवाल वाकई गंभीर हैं और इनके जवाब ज़िला प्रशासन को देने होंगे.
कानून-व्यवस्था और प्रशासन पर सवाल
खुलेआम शराबखोरी का ये नज़ारा केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है. जब लोग सरेआम शराब पीते हैं, तो इससे न केवल महिलाओं और बच्चों को असुविधा होती है, बल्कि अपराध की संभावना भी बढ़ती है. शराब के नशे में झगड़े और अन्य अप्रिय घटनाएँ होना आम बात है.
लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर क्यों प्रशासन इस पर अंकुश नहीं लगा रहा है. क्या अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो ‘नशे से दूरी है ज़रूरी’ जैसे अभियानों का क्या फायदा? ये अभियान तो तब सफल माने जाएँगे जब ज़मीनी स्तर पर बदलाव दिखे, न कि सिर्फ़ कागज़ों पर.
सिलवानी की सड़कों पर दिख रही ये तस्वीर चिंताजनक है और इससे जनता का भरोसा भी डगमगा रहा है. प्रशासन को चाहिए कि वे इस मामले को गंभीरता से लें और न केवल छोटे ढाबों पर, बल्कि शहर के बीचोबीच चल रही इस खुलेआम शराबखोरी पर भी सख़्त कार्रवाई करें.