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जर्जर सरकारी दफ्तरों में जान जोखिम में डाल काम कर रहे कर्मचारी, सिलवानी में बड़ा हादसा का डर!

: सिलवानी में महिला बाल विकास और SDOP कार्यालय सहित कई सरकारी भवन जर्जर हैं। कर्मचारी जान जोखिम में डाल कर काम करने को मजबूर हैं। जानिए क्यों प्रशासन कर रहा है इस गंभीर खतरे की अनदेखी।

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क्या आप जानते हैं कि सिलवानी में कई सरकारी कर्मचारी ऐसे दफ्तरों में काम कर रहे हैं जो जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं? ये इमारतें इतनी खराब स्थिति में हैं कि हर दिन काम पर आना मानो जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। छतें टपकती हैं, दीवारों में दरारें हैं और हर वक्त हादसे का डर बना रहता है, लेकिन मजबूरी में कर्मचारी इन्हीं खतरनाक हालात में अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।

बदहाल बिल्डिंगें, अनदेखी सिस्टम
सिलवानी में महिला बाल विकास कार्यालय और एसडीओपी (SDOP) कार्यालय जैसी महत्वपूर्ण इमारतें अब खंडहर में बदल चुकी हैं। इनकी छतों से प्लास्टर गिर चुका है और लोहे के सरिए साफ दिखाई दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ये इमारतें अभी-अभी खराब हुई हैं; ये कई सालों से इसी बदहाली में हैं। हैरानी की बात यह है कि उच्च अधिकारियों को इस बारे में पूरी जानकारी है, लेकिन उनकी तरफ से मरम्मत या नई इमारत बनाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है।

बारिश में टपकती छतें और भीगते दस्तावेज
सोचिए, जो महिला बाल विकास विभाग गर्भवती महिलाओं और बच्चों के पोषण के लिए अभियान चलाता है, उसी के दफ्तर की हालत इतनी खराब है! बारिश के मौसम में इस कार्यालय की छत से पानी टपकता नहीं, बल्कि धारा के रूप में नीचे आता है। कर्मचारी बेचारे पानी से बचने के लिए अपनी कुर्सियां इधर-उधर सरकाते रहते हैं। इससे सिर्फ कर्मचारी ही परेशान नहीं होते, बल्कि कई बार बेहद ज़रूरी सरकारी दस्तावेज़ भी पानी लगने से खराब हो जाते हैं। यह तो सीधे-सीधे सरकारी कामकाज में बाधा है!

जान हथेली पर रखकर काम, मन में अनजाना डर
इन क्षतिग्रस्त भवनों में काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों के लिए हर दिन एक चुनौती है। वे जानते हैं कि वे अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं, लेकिन नौकरी है तो जाना तो पड़ेगा ही। उनके मन में हमेशा एक अनजाना डर बना रहता है कि कहीं यह जर्जर इमारत कब गिर जाए और किसी बड़े हादसे का कारण बन जाए।

कर्मचारियों का दर्द भी साफ झलकता है। नाम न छापने की शर्त पर कई कर्मचारियों ने बताया कि उन्होंने कई बार मौखिक रूप से और सरकारी पत्रों के माध्यम से भी उच्च अधिकारियों को इन भवनों की बदहाली से अवगत कराया है। लेकिन फिर भी, प्रशासन इस मामले में कोई गंभीरता नहीं दिखा रहा है।

तेज हवा और बारिश में जब पुराने भवन गिरने की खबरें आती हैं, तब सिलवानी के इन कर्मचारियों की चिंता और बढ़ जाती है। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? यह सवाल स्थानीय लोगों और कर्मचारियों के मन में लगातार उठ रहा है।

सरकारी सिस्टम क्यों बना है बेखबर?
एक ओर सरकारें बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित कार्यस्थल मुहैया कराने के दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर सिलवानी जैसे छोटे शहरों में सरकारी कर्मचारी जर्जर और असुरक्षित इमारतों में काम करने को मजबूर हैं। यह हालात सीधे तौर पर सरकारी तंत्र की लापरवाही और अनदेखी को उजागर करते हैं।

यह समझना मुश्किल नहीं है कि कर्मचारियों के लिए ऐसी स्थिति में काम करना कितना मुश्किल होता होगा, जहां हर पल एक डर सताता हो। इससे न सिर्फ उनकी सुरक्षा खतरे में है, बल्कि उनके काम की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है। सरकार और संबंधित विभागों को इस गंभीर समस्या पर तुरंत ध्यान देना चाहिए और इन जर्जर इमारतों की मरम्मत या नए निर्माण के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए ताकि हमारे कर्मचारी सुरक्षित माहौल में काम कर सकें।

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शिवम नामदेव सिलवानी

शिवम नामदेव एक अनुभवी पत्रकार और शिक्षाविद् हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करने के पश्चात, उन्होंने मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित न्यूज़पेपर में लगभग 10 वर्षों तक सिलवानी में संवाददाता के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने जमीनी रिपोर्टिंग, जनहित के मुद्दे, और क्षेत्रीय समाचारों के माध्यम से पत्रकारिता को एक सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित किया।

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