- फैक्ट्रियों से निकल रहा जहरीला पानी और धुआं बना गंभीर समस्या
- एनजीटी के आदेश हवा में, प्रशासन और प्रदूषण विभाग मौन
राजधानी लखनऊ के बीकेटी क्षेत्र की प्रसिद्ध फलपट्टी अब प्रदूषण की चपेट में आ चुकी है। रामपुर देवरई, मोहम्मदपुर, कठवारा, रामपुर बेहड़ा, पहाड़पुर, पलिया सहित दर्जनों गांवों में संचालित फैक्ट्रियां हवा और पानी में ज़हर घोल रही हैं। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला बिना ट्रीटमेंट का जहरीला पानी और धुआं न सिर्फ लोगों की सेहत पर असर डाल रहा है, बल्कि यहां की उपजाऊ जमीन, फलदार पेड़ और भूजल को भी तेजी से नुकसान पहुंचा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार स्थानीय प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और यहां तक कि सीएम पोर्टल पर भी शिकायत की गई, लेकिन नतीजा शून्य रहा। एनजीटी के स्पष्ट आदेशों के बावजूद यहां की फैक्ट्रियों पर न कोई सख्ती हुई और न ही कोई असरदार कार्रवाई।
फैक्ट्रियों का गंदा पानी भूजल को कर रहा जहरीला
फलपट्टी क्षेत्र में कई राइस मिल, नमकीन फैक्ट्रियां, पेठा, बेसन, प्लाई और कच्चे ऑयल के कारखाने हैं। इनमें से ज्यादातर फैक्ट्रियां बिना वेस्ट ट्रीटमेंट के सीधे गंदा पानी जमीन में बहा रही हैं। इसका असर यह हुआ कि आसपास के गांवों के इंडिया मार्का हैंडपंपों से आर्सेनिक और अन्य हानिकारक रसायनों युक्त पानी निकल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पानी बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
सेहत पर भी असर, फैल रही गंभीर बीमारियां
सीएचसी बीकेटी के अधीक्षक डॉ. जेपी सिंह का कहना है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा असर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है। सांस फूलना, छाती में जकड़न, आंखों में जलन, सिर दर्द, खांसी और उल्टी जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं। उन्होंने मास्क पहनने और साफ पानी पीने की सलाह दी है।
धूल और धुएं से बर्बाद हो रही खेती और पेड़-पौधे
फलपट्टी की पहचान आम, अमरूद, शरीफा, आंवला और कटहल जैसे फलों के लिए होती थी, लेकिन अब ये फलदार पेड़ असमय सूखने लगे हैं। धूलकण और प्रदूषित हवा के चलते पौधे ‘सांस’ नहीं ले पा रहे। पत्तों पर जमा धूल से पेड़-पौधे कमजोर हो रहे हैं और फसलें प्रभावित हो रही हैं। कुछ गांवों में तो दो से चार प्रतिशत पौधे सूख चुके हैं।
प्रशासन और प्रदूषण विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल
ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि प्रदूषण विभाग के अधिकारी फैक्ट्रियों की मनमानी पर आंखें मूंदे हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग के कुछ अधिकारी फैक्ट्री मालिकों से ‘सुविधा शुल्क’ लेकर जांच को नजरअंदाज कर रहे हैं। इसी कारण एनजीटी के आदेश और ग्रामीणों की शिकायतें भी बेअसर साबित हो रही हैं।
पशु-पक्षियों पर भी पड़ा असर
प्रदूषण का असर अब न सिर्फ इंसानों पर बल्कि पशु-पक्षियों पर भी दिखाई देने लगा है। पेड़-पौधों पर जमा धूलकण और वायु प्रदूषण के चलते पक्षियों की संख्या में भी गिरावट देखी गई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले जहां सुबह-शाम पक्षियों की चहचहाहट गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
पर्यावरणविदों के मुताबिक अगर समय रहते इस पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले समय में यह इलाका ‘रेड ज़ोन’ में आ सकता है। न सिर्फ कृषि पर असर पड़ेगा, बल्कि कैंसर, लीवर रोग और सांस संबंधी बीमारियों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ेगा।
जरूरत है सख्त कदम की
फलपट्टी क्षेत्र की इस गंभीर समस्या पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है। प्रशासन को चाहिए कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग की जवाबदेही तय करे और गैर-जिम्मेदार फैक्ट्रियों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही जनता में भी पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाया जाए।