नई दिल्ली। देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक अपने पद से इस्तीफा देकर सभी को चौंका दिया है। 74 वर्षीय धनखड़ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना त्यागपत्र सौंपते हुए लिखा कि वह डॉक्टरों की सलाह पर और अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए यह कदम उठा रहे हैं। उनका कार्यकाल अगस्त 2027 तक था, लेकिन उन्होंने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है।
त्यागपत्र में भावनात्मक संदेश
राष्ट्रपति को भेजे गए इस्तीफा पत्र में धनखड़ ने लिखा है कि वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 67 (a) के तहत यह निर्णय ले रहे हैं। पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सभी सांसदों के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। उन्होंने लिखा, “राष्ट्रपति जी का सहयोग मेरे लिए सदैव प्रेरणादायक रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का मार्गदर्शन और समर्थन मेरे लिए अमूल्य रहा है, जिससे मैंने बहुत कुछ सीखा।”
धनखड़ ने अपने पत्र में संसद के सभी सदस्यों के स्नेह, विश्वास और अपनापन को याद करते हुए लिखा, “उपराष्ट्रपति के रूप में मिला अनुभव जीवन भर मेरे साथ रहेगा। इस महान लोकतंत्र की सेवा करना मेरे लिए गर्व और सम्मान की बात रही।”
हालिया स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं
धनखड़ की तबीयत बीते कुछ महीनों से ठीक नहीं चल रही थी।
25 जून 2025: उत्तराखंड के नैनीताल में एक कार्यक्रम के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। कुमाऊं यूनिवर्सिटी के समारोह में शामिल होने के बाद सीने में तेज दर्द की शिकायत हुई थी, जिसके बाद उन्हें राजभवन ले जाकर प्राथमिक उपचार दिया गया था।
9 मार्च 2025: इससे पहले उन्हें सीने में दर्द की शिकायत पर AIIMS दिल्ली में भर्ती कराया गया था। 12 मार्च को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया था।
डॉक्टरों की सलाह को मानते हुए उन्होंने अब पूरी गंभीरता से राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से विराम लेने का निर्णय लिया है।
एक किसान का बेटा बना देश का उपराष्ट्रपति
जगदीप धनखड़ की जिंदगी संघर्ष, मेहनत और सफलता की प्रेरणादायक कहानी है। उनका जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। गांव की प्राथमिक शिक्षा के बाद उन्हें सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ में दाखिला मिला।
उनका NDA (नेशनल डिफेंस एकेडमी) में चयन हुआ था, लेकिन उन्होंने कानून की पढ़ाई चुनी। राजस्थान यूनिवर्सिटी से LLB करने के बाद जयपुर में वकालत शुरू की और जल्द ही राजनीति की ओर रुख किया।
राजनीति में लंबा अनुभव
धनखड़ का राजनीतिक सफर भी बेहद प्रभावशाली रहा है।
1989 से 1991 तक वे झुंझुनू से लोकसभा सांसद रहे।
इसी दौरान वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बने।
2019 में बंगाल के राज्यपाल नियुक्त हुए, जहां उनका कार्यकाल काफी चर्चा में रहा।
6 अगस्त 2022 को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को बड़े अंतर से पराजित कर देश के 14वें उपराष्ट्रपति पद की शपथ ली।
अब आगे क्या?
धनखड़ के इस्तीफे के बाद अब देशभर की निगाहें इस पर टिक गई हैं कि अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा। चुनाव आयोग जल्द ही चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है। राजनीतिक गलियारों में संभावित नामों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
निष्कर्ष
धनखड़ का इस्तीफा भारतीय राजनीति के लिए एक अहम मोड़ है। उनका जीवन, संघर्ष और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उन्होंने अपने जीवन में जिस तरह साधारण किसान परिवार से देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया, वह मिसाल है।