राशिद मीर बेगमगंज
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मजगांव की मासूमों की सच्ची कहानी
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले की तहसील सिलवानी से लगभग 12 किमी दूर, सिलवानी जनपद पंचायत के अंतर्गत आदिवासी बहुल मजगांव टोला (ग्राम बटेर) कल तक सिर्फ maps में एक नाम था, लेकिन आज ये नाम सुर्खियों में है—और वो भी मासूम बच्चियों की आवाज़ की वजह से।
बारिश शुरू होते ही मजगांव की गलियाँ दलदल बन जाती हैं। गाँव से लगभग 3 किमी दूर स्थित सरकारी स्कूल तक पहुंचने के लिए नन्हें छात्र-छात्राएं और आंगनबाड़ी के छोटे बच्चे कीचड़ में पैर फिसलते, किताबें गीली होती हुई, गंदे कपड़ों में संघर्ष करते हुए रोज़ाना स्कूल जाते हैं। ऐसे में पढ़ने की इच्छा तो हर बच्चे में होती है, लेकिन रास्ता सहता नहीं।
कैसे शुरू हुआ ये असरदार अभियान?
हाल ही में कुछ बच्चियों ने देर नहीं सोचा और सोशल मीडिया का सहारा लिया। उन्होंने वीडियो बनाया और वायरल कर दिया, जिसमें नीचे कीचड़ में फिसलते हुए, भरा-भरा रास्ता मुश्किल से पार करते इन मासूमों की तस्वीर सामने है। वीडियो में स्पष्ट किया गया कि:
कितनी बार किताबें गीली हुईं, कपड़े दाग़दार हो गए, और कई बार बच्चे स्कूल ही नहीं पहुँच पाए।
इस वीडियो में बच्चियों ने सीधे निहाज़त से मुख्यमंत्री मोहन यादव, कलेक्टर रायसेन अरुण कुमार विश्वकर्मा, और उक्त जनपद के अधिकारियों से 3 किमी की पक्की सड़क बनाने की गुहार लगाई। उनका कहना था कि गांव वालों ने ग्राम पंचायत और जिला प्रशासन को कई बार आवेदन भेजे, लेकिन सुनवाई कही नहीं हुई।
क्यों बने बार-बार वादे… पर सड़कों की खामोशी?
पिछली चुनावों में (लोकसभा या विधानसभा)—हर बार आदिवासी वोटरों को लाभ पहुचने का वादा ज़रूर हुआ।
परन्तु नीचे की हकीकत ये है कि स्कूल जाने के लिए ये बच्चियाँ हर बरसात में ज़िन्दगी जोखिम में डालती हैं। अंततः सब वादे कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं। सड़क नहीं बनती, बीमारी बढ़ती है, और पढ़ाई बाधित होती है।
सोशल मीडिया की ताक़त: क्या अब प्रशासन सोएगा?
वीडियो वायरल होते ही लोगों ने सिर्फ देख‑देखकर काम नहीं चलाया—कई लोगों ने वीडियो रिकॉर्ड किया, शेयर किया और कमेंट किया कि “ये तो बहुत बड़ी समस्या है”, “कुछ तो करना होगा”।
बच्चियों ने बड़ी मासूमियत से कहा,
> “हमें पढ़ना है… लेकिन कीचड़ रास्ता हमें रोक देता है,”
इन छोटी‑छोटी आवाज़ों की उम्मीद अब सोशल मीडिया की ताक़त से जुड़ी हुई है कि प्रशासन मुकम्मल प्रतिक्रिया दे—या भी इसे सिर्फ एक ट्रेंड मान कर भूल जाएगी।
क्या होना चाहिए? – प्रस्ताव
1. 3 किमी पक्की सड़क बारिश के बाद तुरंत निर्माण शुरू किया जाए।
2. ड्रेन की उचित व्यवस्था—ताकि बारिश में पानी जमा न हो।
3. यदि संभव हो तो:
स्कूल जाने‑आने के लिए निःशुल्क बस / वाहन की व्यवस्था।
बच्चों की आवाज़ से निकलती उम्मीद
मज़गांव के छोटे‑छोटे चेहरों पर पढ़ाई की चाह झलकती है, लेकिन हर साल ये ही कहानी दोहराई जाती है।
ये लड़कियाँ पढ़ना चाहती हैं।
कीचड़ नहीं रोक सकती।
लेकिन सवाल ये है—क्या सिस्टम तैयार है पूरी सुनवाई करने को?
अगले कदम: क्या अब प्रशासन जागेगा?
जिला प्रशासन / राज्य सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया। पर सोशल मीडिया की वायरलिंग छोड़ देने से पहले, यह उम्मीद भी है कि:
जनप्रतिनिधियों द्वारा जायज़ा लिया जाए निजी या सरकारी स्कूल बसों की व्यवस्था पर विचार हो और स्थानीय नेताओं द्वारा बजट मंजूर हो
मजगांव का यह दर्द सिर्फ इन्हीं की कहानी नहीं
गांव‑गांव में कच्ची सड़क, सीमित शिक्षा सुविधाएं, और छोटे‑छोटे बच्चों का रोज़ाना संघर्ष भारत के कई हिस्सों में आम बात होती जा रही है।
मजगांव की बच्चियाँ कोई अपवाद नहीं—बल्कि ये आदिवासी इलाके की हजारों‑हजार मासूमों की आवाज़ का एक छोटा लेकिन शक्तिशाली संदेश है।
निष्कर्ष:
मजगांव की यह वीडियो‑वायरल गुहार प्रशासन और समाज को शब्दों से बहुत आगे बुला रही है। बच्चियाँ कह रही हैं—“हमें पढ़ना है, हमें रास्ता दो।”
अब सवाल सिर्फ इतना है: क्या इस बार उनकी आवाज़ ‘कीचड़’ नहीं, बल्कि ‘सड़क’ और ‘रसोई’ तक पहुंचेगी?