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उत्तर प्रदेश की गौशालाओं का दर्दनाक सच: बारिश और धूप में तड़पकर मर रहे बेजुबान गौवंश!

उत्तर प्रदेश की गौशालाओं में बेजुबान गौवंश भूख, प्यास, और बीमारी से तड़पकर दम तोड़ रहे हैं. अधिकारियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण गायों की बदहाली चरम पर है, जबकि करोड़ों का बजट खर्च किया जा रहा है.

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The painful truth of cow shelters in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश की गौशालाओं से एक बेहद ही परेशान करने वाली खबर सामने आ रही है. जहां एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गायों और गौवंशों के संरक्षण को लेकर सख्त हैं, वहीं दूसरी तरफ राजधानी लखनऊ समेत राज्य के कई जिलों में बनी अस्थायी गौशालाओं में हालात अब बद से बदतर होते जा रहे हैं। बारिश और चिलचिलाती धूप में भूख-प्यास और बीमारी से तड़प-तड़पकर गायें और बछड़े दम तोड़ रहे हैं. पिछले एक हफ्ते में ही बीकेटी विकासखंड में सैकड़ों गौवंशों की मौत हो चुकी है. यह बेहद शर्मनाक है कि जिन गायों को कटने से बचाया जा रहा है, उन्हें संरक्षित करने के नाम पर बनी गौशालाओं में ही मौत के मुंह में धकेला जा रहा है.

गौशालाओं में लापरवाही की हद: कुत्ते नोंच रहे मृत और बीमार गायों को!
बीकेटी विकासखंड की चक पृथ्वीपुर अस्थायी गौशाला का मंजर तो दिल दहला देने वाला है. यहां चारे-पानी, चिकित्सा और देखरेख के अभाव में गौवंशों की जान जा रही है. मृत गायों के शवों और बीमार गौवंशों की ऐसी दुर्दशा है कि कुत्ते उन्हें नोंच-नोंच कर खा रहे हैं. हाल ही में हुई मानसूनी बारिश के कारण गौशाला की जमीन दलदल में बदल गई है, जिससे मवेशियों के पैर कीचड़ में फंस रहे हैं और कमजोर व बीमार गायों की मौत हो रही है. इतना ही नहीं, मृत गायों के शवों को दफनाने की बजाय गौशाला में ही छोड़ दिया जाता है, जिससे बदबू और संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है. इस गौशाला में करीब 70 गौवंश हैं, जिनकी देखभाल के लिए सिर्फ एक केयर टेकर रखा गया है, जो नाकाफी है.

योगी सरकार की प्राथमिकता पर उठे सवाल: बजट होने के बावजूद बदहाली क्यों?
योगी आदित्यनाथ ने 2017 में सत्ता में आने के बाद गायों की रक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में रखा था. उन्होंने गायों और गौवंशों की सुरक्षा के लिए न सिर्फ कई नियम-कानून बनाए, बल्कि इसके लिए भारी भरकम बजट का भी प्रावधान किया, ताकि पैसों की कोई कमी न रहे. लेकिन जमीनी हकीकत आज कुछ और ही कहानी कह रही है। ग्रामीणों की शिकायत पर ‘स्वदेश’ द्वारा बीकेटी विकासखंड की अस्थायी गौशालाओं की पड़ताल में चौंकाने वाले दृश्य सामने आए. यहां मृत गायों के कंकाल पड़े मिले, और कई गौवंश मरे पड़े थे जिन्हें कुत्ते खा रहे थे. ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें कई दिनों से गौशाला से बदबू आ रही थी. जिला प्रशासन को सूचित करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई.

कागजों पर लाखों का खर्च, हकीकत में भुखमरी और अव्यवस्था
पशु आश्रय केंद्र शहादत नगर गढ़ा, किशनपुर, इटौंजा और अन्य केंद्रों की दुर्दशा भी कुछ ऐसी ही है. शहादत नगर गढ़ा के पशु आश्रय केंद्र में लगभग डेढ़ सौ मवेशी हैं, जहां चारे के अभाव में पशु दम तोड़ रहे हैं. चारे की कमी से पशु इतने कमजोर हो गए हैं कि उन्हें उठना-बैठना भी मुश्किल हो रहा है. कई पशु आश्रय केंद्रों के टैग लगे हुए पशु बाहर घूम रहे हैं, जिन्हें भरपेट चारा नहीं मिल रहा है. जानकारी के मुताबिक, 16 पशु आश्रय केंद्रों के निर्माण में मनरेगा के तहत एक करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च की गई है, लेकिन शहादत नगर गढ़ा के केंद्र में न तो भूसा रखने के लिए कोई कमरा बना है और न ही चरही है.

जिम्मेदार अफसरों और ग्राम प्रधानों की “खाऊ-कमाऊ” नीति के चलते राजधानी के आठों विकासखंडों में बने पशु आश्रय केंद्रों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. गांव-गांव में खुली गौशालाओं में रखे गए मवेशियों की हालत बेहद खराब है. उनकी भूख-प्यास मिटाना अब एक बड़ी चुनौती बन गई है. सरकारी पशु आश्रय केंद्रों में पशुओं के लिए चारे का अभाव और पर्याप्त टीन शेड व अन्य व्यवस्थाओं की कमी के चलते वे बरसात में भीगकर मर रहे हैं.

धूप और बारिश से बचाव का इंतजाम नहीं, गौवंशों का इलाज भी नहीं!
यह बेहद दुखद है कि राज्य के सभी जिलों में बनी गौशालाओं में अभी तक गौवंशों को धूप और बारिश से बचाने के लिए छाया का इंतजाम नहीं हो सका है. कीचड़, गंदगी और अव्यवस्था के बीच पूरे दिन कड़ी धूप और बारिश में गौवंश तड़प रहे हैं. उनके चारे-पानी और देखभाल के लिए कहीं भी बेहतर इंतजाम नहीं किए गए हैं. बीकेटी तहसील क्षेत्र सहित विभिन्न जिलों में स्थापित ज्यादातर गौशालाओं में गायें बीमार पड़ी हैं, लेकिन उनका इलाज तक नहीं किया जा रहा है.

मोहनलालगंज, गोसाईगंज, माल, मलिहाबाद सहित आठों विकासखंडों में संचालित गौसंरक्षण केंद्रों की हालत लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी खराब है. गौशालाओं में जो टीन शेड बनाए गए हैं, वे संरक्षित मवेशियों के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जिससे आधे से ज्यादा गौवंश कड़ी धूप में बाहर ही रहने को मजबूर हैं.

“खाऊ-कमाऊ” नीति का शिकार गौवंश: क्या सरकार उठाएगी कोई सख्त कदम?
सरकार गौवंश के लिए चाहे जितने भी उपाय क्यों न कर ले, जिम्मेदारों की लापरवाही के चलते बेसहारा पशुओं के लिए गौशालाओं में बदइंतजामी चरम पर है. खानापूर्ति का आलम यह है कि गौशालाओं में साफ-सफाई और पशुओं को कड़ी धूप व बारिश से बचाने के लिए प्रशासन द्वारा अब तक कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए हैं. इस चिलचिलाती धूप और बारिश में गौशालाओं में संरक्षित गौवंशों को पर्याप्त मात्रा में चारा-पानी न मिलने के चलते वे बीमार होकर दम तोड़ रहे हैं.

यह साफ तौर पर दर्शाता है कि गौशालाओं में बड़े पैमाने पर धांधली का खेल चल रहा है, जो किसी से छिपा नहीं है. जिले में बेसहारा गौवंश को आश्रय देने के लिए गौशालाएं तो खोली गईं, लेकिन अब ये गौशालाएं जिम्मेदार अफसरों और प्रधानों के लिए एक ‘आय का साधन’ बन गई हैं. अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार इन लापरवाह अधिकारियों और प्रधानों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करेगी, ताकि गौशालाओं में गौवंशों की जान बचाई जा सके और उन्हें सही मायने में संरक्षण मिल सके?

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अजय सिंह चौहान लखनऊ

अजय सिंह चौहान – एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार अजय सिंह चौहान लखनऊ (उत्तर प्रदेश) निवासी एक वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में पिछले ढाई दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है। वर्ष 2009 में उन्होंने आगरा से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे निरंतर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे और उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लखनऊ जिले के संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। अपने 25 वर्षों के व्यापक अनुभव के दौरान अजय सिंह चौहान ने जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग, जनहित से जुड़े मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों को मजबूती से उठाया। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा न मानकर, समाज सेवा का सशक्त माध्यम माना और हमेशा निष्पक्ष, निर्भीक व जनपक्षधर लेखन को प्राथमिकता दी। वर्तमान में अजय सिंह चौहान मध्य प्रदेश के प्रमुख हिन्दी दैनिक स्वदेश के लखनऊ संस्करण में ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखन शैली, अनुभव और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल एक कुशल पत्रकार, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बना दिया है।

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