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shortage of urea fertilizer “का वर्षा जब कृषि सुखानी”: यूरिया खाद की किल्लत से किसान बेहाल, अधिकारी सिर्फ आश्वासन तक सीमित UPNEWS

shortage of urea fertilizer लखनऊ समेत आसपास के विकासखंडों में यूरिया खाद की भारी कमी से किसान बेहाल हैं। खरीफ की फसल बर्बादी की कगार पर है, जबकि अधिकारी सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं।

On: August 26, 2025 10:48 PM
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shortage of urea fertilizer

shortage of urea fertilizer उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और आसपास के विकासखंडों में इस समय किसानों की बेबसी देखने को मिल रही है। खरीफ की फसल खेतों में खड़ी है, लेकिन खाद की कमी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। हालात ये हैं कि गांव-गांव में अन्नदाता हाथ मल रहे हैं और यही कह रहे हैं – “का वर्षा जब कृषि सुखानी”। यानी जब समय निकल जाए तो मदद का कोई मतलब नहीं। (Farmers said – if there is no fertilizer on time then hard work is useless)

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद सख्त निर्देश दिए हैं कि किसानों को समय पर खाद मिले, मगर जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। बीकेटी विकासखंड से लेकर मलिहाबाद, माल, मोहनलालगंज और गोसाईंगंज तक हर जगह यूरिया खाद की किल्लत है।

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खाद के बिना मुरझा रही धान की फसल

धान की रोपाई के बाद जैसे ही पौधे बढ़ने लगे, वैसे ही किसानों को खाद की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ी। लेकिन बाजार में यूरिया नदारद है। किसान कई-कई दिन गोदाम और दुकानों के चक्कर लगा रहे हैं। हालत यह है कि साहूकारों से कर्ज लेकर रोपी गई फसल अब मुरझाने की कगार पर है।

कठवारा गांव के किसान आनंद सिंह उर्फ गोलऊ बताते हैं –
“इस बार छह बीघा धान लगाया है। पिछले कई दिनों से यूरिया के लिए यहां-वहां भटक रहा हूं, लेकिन कहीं खाद नहीं मिल रही। खेत में मेहनत बर्बाद हो रही है, और हम लोग दर-दर भटक रहे हैं।”

कालाबाजारी ने बढ़ाई किसानों की मुश्किलें

किसान संगठनों का आरोप है कि यूरिया खाद की कृत्रिम कमी पैदा कर दी गई है। गोदामों में स्टॉक होने के बावजूद दुकानों पर खाद उपलब्ध नहीं कराई जा रही। कालाबाजारी करने वाले लोग किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर खाद को ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं।

इस वजह से जो किसान समय पर खाद नहीं खरीद पा रहे, वे अब कर्ज और कंगाली के चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं। छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं क्योंकि उनके पास न तो ज्यादा जमीन है और न ही इतना पैसा कि वे महंगे दाम पर खाद खरीद सकें।

अधिकारी दे रहे सिर्फ आश्वासन

किसानों का कहना है कि कृषि विभाग के अधिकारी सिर्फ आश्वासन की घुट्टी पिला रहे हैं। जब किसान उनसे शिकायत करने पहुंचते हैं तो यही कहा जाता है कि जल्द खाद उपलब्ध करा दी जाएगी। मगर असलियत यही है कि हफ्तों से किसानों को इंतजार कराया जा रहा है और खेत बर्बादी की कगार पर पहुंच चुके हैं।

बीकेटी, मोहनलालगंज और मलिहाबाद के किसानों ने आरोप लगाया है कि वे बार-बार अधिकारियों से मिल रहे हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।

किसान बोले – मेहनत बेकार जा रही

धान की खेती करने वाले कई किसानों ने बताया कि अगर इस हफ्ते भी खाद नहीं मिली तो पूरी फसल चौपट हो जाएगी। ऐसे में उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ेगा। किसान अब कह रहे हैं कि सरकार सिर्फ कागजों में किसानों की मदद करती है, असल में जमीनी स्तर पर हालात बहुत खराब हैं।

गांव-गांव में यही चर्चा है कि खाद की कमी ने इस बार किसानों की उम्मीदें तोड़ दी हैं। खेतों में मेहनत करने वाले किसान आज हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

किसान संगठनों ने चेताया

इस संकट को देखते हुए किसान संगठनों ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही खाद की आपूर्ति नहीं हुई तो आंदोलन किया जाएगा। किसान नेता कह रहे हैं कि अन्नदाता का सब्र अब जवाब दे रहा है।

उन्होंने कहा कि किसान ही हैं जो देश का पेट भरते हैं, और अगर इन्हीं को समय पर खाद-पानी न मिले तो खाद्यान्न उत्पादन कैसे बढ़ेगा? सरकार अगर वास्तव में किसानों की चिंता करती है तो तुरंत गोदामों से खाद निकालकर गांव-गांव पहुंचाए।

सरकार के वादे और हकीकत

राज्य और केंद्र सरकार दोनों ने किसानों की खुशहाली के दावे किए हैं। कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि मदद हमेशा देर से आती है। किसान पूछ रहे हैं कि जब समय निकल जाए तो ऐसी मदद का क्या फायदा?

दरअसल, यही वजह है कि लोग कह रहे हैं – “का वर्षा जब कृषि सुखानी”।

गांवों में बढ़ रही बेचैनी

लखनऊ और आसपास के गांवों में किसानों की बेचैनी बढ़ती जा रही है। खेतों में लगी फसल दिन-ब-दिन कमजोर हो रही है और किसान मजबूरी में दुकानों के बाहर लाइन लगाए खड़े हैं। कई जगहों पर किसान आपस में मिलकर खाद खोजने निकले, लेकिन खाली हाथ लौटे।

महिलाएं तक कह रही हैं कि घर के चूल्हे-चौके का इंतजाम कैसे होगा, जब खेत की पैदावार ही नहीं बचेगी।

किसानों की उम्मीद सरकार पर टिकी

किसानों की आखिरी उम्मीद सरकार पर ही टिकी है। वे चाहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी खुद इस मामले में सख्ती दिखाएं और खाद की कालाबाजारी पर तुरंत रोक लगाई जाए। अगर आने वाले दिनों में खाद उपलब्ध नहीं हुई तो किसानों की हालत और ज्यादा खराब हो सकती है।

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अजय सिंह चौहान लखनऊ

अजय सिंह चौहान – एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार अजय सिंह चौहान लखनऊ (उत्तर प्रदेश) निवासी एक वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में पिछले ढाई दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है। वर्ष 2009 में उन्होंने आगरा से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे निरंतर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे और उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लखनऊ जिले के संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। अपने 25 वर्षों के व्यापक अनुभव के दौरान अजय सिंह चौहान ने जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग, जनहित से जुड़े मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों को मजबूती से उठाया। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा न मानकर, समाज सेवा का सशक्त माध्यम माना और हमेशा निष्पक्ष, निर्भीक व जनपक्षधर लेखन को प्राथमिकता दी। वर्तमान में अजय सिंह चौहान मध्य प्रदेश के प्रमुख हिन्दी दैनिक स्वदेश के लखनऊ संस्करण में ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखन शैली, अनुभव और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल एक कुशल पत्रकार, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बना दिया है।

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