Drug addiction on the rise among children लखनऊ, नवाबों की नगरी, जो अपनी तहज़ीब और विरासत के लिए जानी जाती है, आज एक दिल दहला देने वाली सच्चाई से जूझ रही है. यहां मासूम बचपन नशे के दलदल में धंसता जा रहा है. जिन हाथों में कॉपी-किताबें होनी चाहिए, उनमें आज व्हाइटनर, थिनर और आयोडेक्स की शीशियां नजर आती हैं. यह तस्वीर न सिर्फ परेशान करती है, बल्कि हमारे समाज और प्रशासन पर भी कई सवाल खड़े करती है. (Innocent childhood in Lucknow is under the shadow of drug addiction: Will the administration and society together be able to save them?)
नशे का नया चेहरा: मासूमों की बेबसी
पहले जहां नशे की बात आती थी, तो शायद बड़े-बुजुर्गों या युवाओं की तस्वीरें जेहन में आती थीं, लेकिन अब यह भयानक लत आठ से बारह साल के बच्चों को अपनी गिरफ्त में ले रही है. इन बच्चों के लिए नशा सिर्फ एक लत नहीं, बल्कि उनकी बेबसी और अभावों का परिणाम बन गया है. लखनऊ के रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों और सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा बीनकर पेट भरने वाले सैकड़ों बेसहारा बच्चे शाम को जो भी पैसा कमाते हैं, उससे अपना नशा पूरा करते हैं और भूखे ही सो जाते हैं. यह कितना दर्दनाक है कि जिस उम्र में इन्हें खेलकूद और शिक्षा मिलनी चाहिए, उस उम्र में ये मौत के सामान के आदी हो रहे हैं.
घर-घर पहुंच रहा नशा: मां-बाप बेखबर
यह समस्या सिर्फ सड़कों पर भटकने वाले बच्चों तक ही सीमित नहीं है. रिपोर्ट बताती है कि कई बच्चे अपने घरों में ही थिनर, व्हाइटनर, ऑयल पेंट और पेट्रोल जैसी चीजों को सूंघकर नशे की पूर्ति कर रहे हैं और उनके मां-बाप को इसकी भनक तक नहीं लग रही. यह दिखाता है कि समस्या कितनी गहरी है और किस तरह से हमारे घरों की दहलीज तक पहुंच चुकी है. बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान न देना और उन्हें अकेला छोड़ देना इस गंभीर स्थिति को बढ़ावा दे रहा है.
प्रशासन की कुंभकर्णी नींद और कागजी योजनाएं
सरकार ने अनाथ और बेसहारा बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें शिक्षा देने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद कमजोर है. यह योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित होकर रह गई हैं और इनका लाभ जरूरतमंद बच्चों तक पहुंच ही नहीं पा रहा. प्रशासन की इस लापरवाही के कारण नशेड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, और इसका खामियाजा हमारे भविष्य यानी बच्चों को भुगतना पड़ रहा है. ऐसा लगता है मानो पूरा तंत्र गहरी नींद में सो रहा है, जबकि बच्चे धीरे-धीरे मौत के मुंह में समा रहे हैं.
नशे की दलदल: एक बुराई अनेक समस्या
नशा सिर्फ सेहत ही नहीं बिगाड़ता, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी बर्बाद कर देता है. बचपन में जहां ये बच्चे कूड़ा-कचरा बीनकर अपने नशे की पूर्ति करते हैं, वहीं बड़े होकर इनकी नशे की खुराक भी बढ़ जाती है. स्मैक, हेरोइन जैसे महंगे नशे की लत में फंसकर ये बच्चे चोरी-चकारी और फिर बड़े अपराधी बन जाते हैं. ये समाज के लिए मुसीबत बन जाते हैं और एक ऐसी कड़ी में फंस जाते हैं जिससे निकलना लगभग नामुमकिन हो जाता है.
नशा तस्करी का जाल: छोटे बच्चे बन रहे मुखबिर
शहर में नशा तस्करी का मकड़जाल तेजी से फैल रहा है. आलमबाग, चारबाग, नाका, हुसैनगंज, बाजारखाला, चिनहट, जानकीपुरम, मड़ियांव, मलिहाबाद, हसनगंज, सआदतगंज जैसे इलाकों में ये गिरोह सक्रिय हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि ये तस्कर पुलिस से बचने के लिए छोटे बच्चों को मुखबिर के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. गलियों के बाहर खड़े ये बच्चे जैसे ही कोई अनजान शख्स या पुलिस को देखते हैं, तुरंत तस्करों को अलर्ट कर देते हैं, जिससे उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है. यह दिखाता है कि कैसे मासूम बच्चों को इस गंदे धंधे में शामिल किया जा रहा है.
सेहत पर कहर: अंदर से खोखला कर रहा नशा
चिकित्सकों का कहना है कि व्हाइटनर जैसे पदार्थों में मिले केमिकल लीवर, फेफड़ों और किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं. लगातार सेवन से व्यक्ति मानसिक रूप से भी अस्थिर हो जाता है और नशे का आदी हो जाता है. ऐसे में इन बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है, और वे कम उम्र में ही कई गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं.
क्या है समाधान? मिलकर लड़ना होगा यह जंग
यह सिर्फ सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हम सभी को इस समस्या से मिलकर लड़ना होगा. नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध: जिस तरह अल्कोहल युक्त कई दवाइयों को प्रतिबंधित किया गया है, उसी तरह सिलोचन, आयोडेक्स और व्हाइटनर जैसे नशीले पदार्थों को भी सरकार को प्रतिबंधित करना चाहिए. व्हाइटनर पर स्पष्ट रूप से लिखा होता है कि इसे नाबालिग को नहीं बेचा जा सकता, फिर भी व्यापारी धड़ल्ले से इसे बच्चों को बेच रहे हैं. इस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए.
योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन: सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को कागजों से निकालकर जमीनी स्तर पर लागू करना बेहद जरूरी है. अनाथ और बेसहारा बच्चों तक इन योजनाओं का लाभ हर हाल में पहुंचना चाहिए.
स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका: शहर में अनगिनत स्वयंसेवी संगठन और संस्थाएं समाज सेवा के बड़े-बड़े दावे करते हैं. उन्हें आगे आकर इन बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने, उनके खान-पान और शिक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.
जागरूकता अभियान: माता-पिता और अभिभावकों को अपने बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देने और नशे के खतरों के प्रति जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाने चाहिए.
नशा मुक्ति केंद्र और परामर्श: नशे के शिकार बच्चों के लिए विशेष नशा मुक्ति केंद्र और परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए, जहां वे इस लत से बाहर निकल सकें.
नशे की लत कैसे छोड़ें?
अगर कोई व्यक्ति नशे की लत से छुटकारा पाना चाहता है, तो उसे कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
दृढ़ इच्छाशक्ति: सबसे महत्वपूर्ण है नशे को छोड़ने का पक्का इरादा.
विकल्प अपनाएं: जब सिगरेट या गुटखे की तलब लगे, तो इलायची या सौंफ का सेवन करें.
दवाओं का सहारा: विशेषज्ञ की सलाह से दवाओं के जरिए भी ड्रग्स की लत को छोड़ा जा सकता है.
योग और व्यायाम: योग, ध्यान और एक्सरसाइज कर खुद को फिट रखें. यह मानसिक शांति भी प्रदान करता है.
अपनों का सहारा: अपने परिवार और दोस्तों से मदद मांगें. उनका सहारा आपको इस मुश्किल सफर में ताकत देगा.