गुरुर (छत्तीसगढ़)। एक तरफ सरकार गांवों के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो दूसरी तरफ कई गांव ऐसे भी हैं जहां जमीनी हालात बिल्कुल विपरीत हैं – बुनियादी सुविधाओं के लिए लोग आज भी संघर्ष कर रहे हैं। गुरुर विकासखंड के ग्राम खुंदनी तक पहुंचने वाला मुख्य मार्ग आज भी बदहाली के हालात में है। इस सड़क पर गड्ढों और उखड़े गिट्टियों के कारण आए दिन हादसे हो रहे हैं। ग्रामीण और स्कूली बच्चे हर दिन इस रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं, लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि या जिम्मेदार अधिकारी ने अब तक सुध नहीं ली है।
हर बार अनदेखी, हर बार ठोकर
ग्रामीणों के मुताबिक खुंदनी मार्ग की मरम्मत की मांग सालों से की जा रही है। कई बार शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन भी सौंपे गए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। सड़क की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि बारिश में गड्ढों में पानी भर जाता है और राहगीरों को यह पता ही नहीं चलता कि कहां सड़क है और कहां जानलेवा गड्ढा।
स्कूली बच्चों के लिए बना जानलेवा सफर
खुंदनी मार्ग से रोजाना कई स्कूली बच्चे पढ़ाई के लिए गुरुर ब्लॉक मुख्यालय तक आते-जाते हैं, लेकिन सड़क की बदहाली ने उनका सफर जोखिमभरा बना दिया है। गड्ढों से भरी इस सड़क पर साइकिल और बाइक सवार बच्चे कई बार गिरकर घायल हो चुके हैं। बुजुर्ग और महिलाएं भी इस रास्ते में चोटिल हो चुके हैं, लेकिन अफसोस कि जिम्मेदार अब तक बेखबर बने हुए हैं।
सिर्फ खुंदनी ही नहीं, कई गांव प्रभावित
यह मार्ग केवल खुंदनी गांव के लिए ही नहीं, बल्कि खोरदो, अकलवारा, परसुली, डढारी, नरबदा, सरबदा, दियाबाती, बासीन और गंगोरीपार जैसे दर्जनों गांवों के लोगों की लाइफलाइन है। इन गांवों के लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों, इलाज, शिक्षा और व्यापार के लिए इसी रास्ते से आना-जाना पड़ता है। सड़क की हालत खराब होने के कारण बीमार मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में भी देर हो जाती है, जिससे कई बार स्थिति गंभीर हो जाती है।
जनप्रतिनिधियों की उदासीनता पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनाव के वक्त ही दिखाई देते हैं, बाद में जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं रखते। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत इस मार्ग को दुरुस्त करने के लिए कई बार प्रस्ताव भेजे गए हैं, लेकिन कोई भी कार्य प्रारंभ नहीं हुआ। लोग अब खुद सड़क पर उतरकर विरोध करने की तैयारी में हैं।
क्या कहती है जनता – आम लोगों की पीड़ा
ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि गांव की सड़कों का सुधार सिर्फ कागजों और भाषणों तक ही सीमित रह गया है। वे पूछते हैं – क्या हमें हर बार बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज़ उठानी पड़ेगी? आखिर कब सुनी जाएगी हमारी बात? अगर इसी तरह हालात बने रहे तो किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता है, जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की होगी
अब उम्मीद है प्रशासन की पहल पर
लोगों को उम्मीद है कि अब शासन और जिला प्रशासन इस मार्ग की गंभीर स्थिति को ध्यान में रखते हुए जल्द मरम्मत और डामरीकरण कार्य शुरू कराएगा। वरना ग्रामीणों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। ये मामला न सिर्फ विकास से जुड़ा है, बल्कि जनजीवन की सुरक्षा का भी सवाल है।