जगदलपुर। Bastar Dussehra 2025 विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व अपनी अनूठी परंपराओं और सदियों पुरानी रस्मों के लिए जाना जाता है। बुधवार की रात एक बार फिर इस पर्व का अहम हिस्सा “मावली परघाव” पूरी आस्था और परंपरा के साथ निभाया गया। यह रस्म दंतेवाड़ा की मावली माता और जगदलपुर की दंतेश्वरी माता के मिलन का प्रतीक मानी जाती है। इस मौके पर मंदिर प्रांगण और आसपास का इलाका भक्तिमय माहौल से गूंज उठा।
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माईजी की डोली का स्वागत बना यादगार पल
परंपरा के मुताबिक, दंतेवाड़ा से मावली माता की छत्र डोली जगदलपुर लाई गई। मंदिर पहुंचते ही राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और बस्तरवासी श्रद्धालुओं ने डोली का भव्य स्वागत किया। आतिशबाजियों और फूलों की बारिश ने पूरे माहौल को और भी शानदार बना दिया। यह दृश्य देखकर श्रद्धालुओं का उत्साह दोगुना हो गया। Bastar Dussehra 2025
इस खास मौके पर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अरुण साव, वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण देव, महापौर संजय पांडे, कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी सुन्दरराज पी, कलेक्टर हरीस एस और एसपी शलभ सिन्हा मौजूद रहे। वहीं, दंतेवाड़ा से भी कलेक्टर कुणाल दुदावत और एसपी गौरव राय डोली के साथ पहुंचे।
मावली परघाव: परंपरा और आस्था का संगम
‘मावली परघाव’ रस्म को बस्तर दशहरा का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। इसमें जंगल में पाए जाने वाले खास फूलों से एक “साफा” तैयार किया जाता है। यह साफा राजा को पहनाया जाता है और इसकी पूजा की जाती है। इसके बाद माईजी की डोली को राजमहल परिसर स्थित दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित किया जाता है। Bastar Dussehra 2025
यह परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। इस रस्म से यह संदेश मिलता है कि बस्तर की धरती पर देवी-देवताओं के साथ-साथ जंगल, फूल-पौधे और प्रकृति भी उतनी ही पवित्र मानी जाती है। Bastar Dussehra 2025
माटी पुजारी ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा
बस्तर माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने इस अवसर पर माईजी की डोली की पूजा-अर्चना की। पूजा पूरी होने के बाद डोली को दंतेश्वरी मंदिर के भीतर स्थापित कर दिया गया, जहां यह दशहरा पर्व के समापन तक विराजमान रहेगी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह रस्म हर साल उनके लिए बेहद खास होती है। भक्तजन मानते हैं कि इस मिलन से समृद्धि, शांति और खुशहाली का आशीर्वाद मिलता है। Bastar Dussehra 2025
उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
बुधवार की रात जगदलपुर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। हर कोई इस ऐतिहासिक रस्म को अपनी आंखों से देखने के लिए मंदिर पहुंचा। डोली के स्वागत के दौरान जयकारों की गूंज और भक्तों की उमंग ने इस अनूठी परंपरा को और भी भव्य बना दिया।
सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक
बस्तर दशहरा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का परिचायक है। इस पर्व की खासियत यह है कि इसमें किसी मूर्ति की स्थापना नहीं होती, बल्कि प्रकृति, परंपरा और जन-भागीदारी से देवी-देवताओं की पूजा होती है।
‘मावली परघाव’ जैसी रस्में आज भी यह साबित करती हैं कि बस्तर की संस्कृति कितनी गहरी जड़ों से जुड़ी हुई है। यह परंपरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आदिवासी और स्थानीय समाज की सामूहिक आस्था और संस्कृति की झलक भी प्रस्तुत करती है। Bastar Dussehra 2025
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