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Dilapidated school life danger रायसेन में जर्जर स्कूल: 60 बच्चों की जिंदगी खतरे में, क्या प्रशासन राजस्थान जैसे हादसे का इंतजार कर रहा

Dilapidated school life danger रायसेन जिले के उदयपुरा जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले ग्राम कुकरा सरकारी स्कूल की छत कभी भी ढह सकती है। करीब 60 बच्चे रोज़ मौत के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। दो बार शिकायत के बावजूद अधिकारी चुप हैं। क्या प्रशासन राजस्थान के झालावाड़ हादसे जैसे किसी त्रासदी का इंतजार कर रहा है?

Dilapidated school life danger

Dilapidated school life danger रायसेन जिले की सीमा पर बसे छोटे से गांव कुकरा का शासकीय स्कूल आज बच्चों के लिए पढ़ाई का मंदिर नहीं, बल्कि मौत का घर बनता जा रहा है। यहां करीब 60 बच्चे रोज़ाना उस जर्जर भवन में पढ़ाई करने जाते हैं जिसकी छत और दीवारें किसी भी पल ढह सकती हैं। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि दो बार शिक्षकों द्वारा लिखित आवेदन देने के बावजूद जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग ने इस खतरनाक स्थिति पर कोई कदम नहीं उठाया। सवाल उठता है—क्या अधिकारी राजस्थान के झालावाड़ जैसे दर्दनाक हादसे का इंतजार कर रहे हैं?

(The roof of the government school in Kukra village under Udaypura Janpad Panchayat of Raisen district can collapse anytime. About 60 children are forced to study under the shadow of death every day. Despite two complaints, the officials are silent. Is the administration waiting for a tragedy like the Jhalawar accident in Rajasthan?)

मौत के साए में पढ़ाई कर रहे मासूम

कुकरा स्कूल का भवन पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। छत जगह-जगह से टूटी हुई है, दीवारों में चौड़ी दरारें हैं और बरसात में पानी टपकता है। बच्चों को क्लासरूम में छाते और प्लास्टिक के टुकड़े लेकर बैठना पड़ता है।

Dilapidated school life danger

गांव के लोग साफ कहते हैं कि यह भवन किसी भी समय भरभराकर गिर सकता है। लेकिन इसके बावजूद प्रशासन और शिक्षा विभाग की चुप्पी ग्रामीणों के गुस्से को और बढ़ा रही है।

शिक्षकों ने दिया था आवेदन, कार्रवाई नहीं

गांव के शिक्षकों ने इस जर्जर हालत को लेकर दो बार विभागीय अधिकारियों को आवेदन दिया। आवेदन में स्पष्ट लिखा गया कि यह भवन बेहद खतरनाक है और इसमें स्कूल चलाना बच्चों की जान के लिए खतरा है। उन्होंने मांग की थी कि बच्चों को तुरंत सुरक्षित भवन में शिफ्ट किया जाए।

लेकिन अफसोस! आवेदन फाइलों में दबकर रह गया और अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। यह लापरवाही सीधे-सीधे बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ है।

क्या राजस्थान जैसे हादसे का इंतजार?

यह मामला इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि हाल ही में राजस्थान के झालावाड़ जिले के पलोदी गांव में सरकारी स्कूल की छत गिरने से बड़ा हादसा हुआ था। उस हादसे में करीब 20 बच्चे घायल हुए और 7 मासूमों की मौत हो गई।

यह घटना पूरे देश को झकझोर गई थी। जयपुर हाईकोर्ट तक को कहना पड़ा कि यह सिर्फ हादसा नहीं बल्कि नैतिक, प्रशासनिक और संवैधानिक विफलता है। अदालत ने यहां तक कहा कि इस घटना से बच्चों और उनके परिवारों का शिक्षा व्यवस्था पर से भरोसा टूट गया।

घटिया निर्माण और विभागीय लापरवाही

झालावाड़ हादसे की जांच में साफ हुआ कि घटिया निर्माण सामग्री और पीडब्ल्यूडी की लापरवाही इस त्रासदी की सबसे बड़ी वजह बनी। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से लेकर शिक्षा विभाग और पंचायती राज विभाग तक सभी से जवाब मांगा।

ऐसे में सवाल यह है कि मध्यप्रदेश सरकार और रायसेन जिला प्रशासन क्यों आंखें मूंदे बैठा है? क्यों बच्चों को अब तक सुरक्षित जगह पर शिफ्ट नहीं किया गया? क्या यहां भी किसी बड़े हादसे का इंतजार है?

ग्रामीणों का आक्रोश

गांव कुकरा के लोगों का कहना है कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय रोज़ दहशत में जीते हैं। “हमें लगता है कि पता नहीं हमारा बच्चा पढ़ाई करने जाएगा या फिर किसी हादसे का शिकार हो जाएगा,” एक अभिभावक ने आंखों में आंसू भरकर कहा।

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गांववालों का आरोप है कि अधिकारी सिर्फ कागजों में रिपोर्ट तैयार करते हैं। जमीन पर न तो कोई मरम्मत की जाती है और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था। लोग पूछ रहे हैं कि अगर कोई त्रासदी हो गई तो आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा—जिला कलेक्टर, शिक्षा विभाग या फिर भोपाल की सरकार?

अदालतों तक पहुंच सकता है मामला

राजस्थान हाईकोर्ट ने जब झालावाड़ हादसे पर खुद संज्ञान लिया और सरकारों को नोटिस थमाए, तो क्यों न मध्यप्रदेश में भी अदालत को कदम उठाना पड़े? अगर प्रशासन इसी तरह सोता रहा तो ग्रामीणों के पास कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

प्रशासन पर उठ रहे बड़े सवाल

आखिर दो बार आवेदन देने के बाद भी कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

बच्चों को सुरक्षित भवन में शिफ्ट करने में इतनी देरी क्यों?

क्या अधिकारी राजस्थान जैसे हादसे से सबक नहीं ले रहे?

अगर कोई बच्चा हादसे का शिकार हुआ तो जवाबदेही किसकी होगी?

राजनीति और अफसरशाही का मौन खेल

कुकरा जैसे छोटे गांवों की समस्याओं पर न तो नेताओं की नजर पड़ती है और न ही अफसरों की। नेताओं के भाषणों में “शिक्षा” और “बच्चों का भविष्य” सुनाई देता है, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि बच्चे मौत के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

प्रशासन को अब जागना ही होगा

कुकरा का स्कूल हादसे की दस्तक दे रहा है। हर दरार, हर झरता प्लास्टर और हर रिसती छत यह बता रही है कि अब वक्त हाथ से निकल रहा है। प्रशासन को तुरंत इस भवन को खाली कराकर बच्चों को सुरक्षित जगह पर शिफ्ट करना चाहिए।

यह सिर्फ रायसेन का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल पूरे मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर है। अगर अब भी अधिकारी नहीं जागे, तो यहां भी झालावाड़ जैसा दर्दनाक हादसा होना तय है।

ग्राम पंचायत सचिव मनीष शर्मा से इस विषय में बात की गई तो उन्होंने साफ कहा कि गाँव में ऐसा कोई दूसरा भवन उपलब्ध नहीं है, जहाँ स्कूल को शिफ्ट किया जा सके। उन्होंने बताया कि इस समस्या को लेकर वे दो बार संबंधित अधिकारियों को अवगत करा चुके हैं, लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

सचिव ने चिंता जताते हुए कहा कि “हम खुद नहीं चाहते कि बच्चों की पढ़ाई इस जर्जर भवन में हो, क्योंकि यह कभी भी गिर सकता है और बड़ा हादसा हो सकता है।” उन्होंने आगे कहा कि अधिकारियों को कई बार जानकारी देने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर लगातार खतरा बना हुआ है।

कुकरा स्कूल का मामला बताता है कि सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता में मासूम बच्चों की सुरक्षा कहीं नहीं है। यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की असलियत है। आज जरूरत है कि शासन-प्रशासन तुरंत कदम उठाए, वरना हादसे के बाद सिर्फ बयानबाज़ी और मुआवजे के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

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