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हरियाली अमावस्या पर जगमगाई ‘हरि ज्योति’ परंपरा: लोक संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी अनोखी विरासत

रायसेन जिले सहित मालवा-नर्मदा अंचल में हरियाली अमावस्या पर ‘हरि ज्योति’ परंपरा धूमधाम से मनाई गई। गाय के गोबर से बने चित्र, बेटियों का मायके आना और पर्यावरणीय संदेश इस परंपरा को खास बनाते हैं। इसे अगली पीढ़ी तक सहेजना जरूरी है।

On: July 24, 2025 9:03 PM
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लेखक: कमल याज्ञवल्क्य | बरेली (रायसेन)

रायसेन जिले सहित मालवा-नर्मदा अंचल के गांवों में हरियाली अमावस्या का पर्व इस बार भी पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस मौके पर खासकर ग्रामीण अंचलों में ‘हरि ज्योति’ की परंपरा देखने को मिली, जो न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि इसमें पर्यावरण संरक्षण और लोक कलाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

क्या है ‘हरि ज्योति’ परंपरा?
हरियाली अमावस्या पर ग्रामीण घरों में दरवाजों के दोनों ओर गाय के गोबर से “हरि ज्योति” की विशेष आकृतियां बनाई जाती हैं। इन चित्रों में पत्ते, बेल-बूटे, दीपक, ‘श्री’ का अंक और धार्मिक प्रतीक उकेरे जाते हैं। यह परंपरा भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मानी जाती है। इसे महिलाएं अपने हाथों से बनाती हैं, और यह पूरी तरह से जैविक एवं पारंपरिक होती है।

घर-आंगन की शुद्धता और सजावट
हरियाली अमावस्या के दिन गांव की महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनती हैं और गाय के हरे गोबर से आंगन और घर की लिपाई करती हैं। यह सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गोबर की जैविक उपयोगिता का भी संदेश देती है। यही नहीं, कई महिलाएं तुलसी चौरा और गोशाला में भी हरि लेखन करती हैं।

बेटियों का मायके आना – रिश्तों में नई रंगत
इस पर्व की एक खास परंपरा यह भी है कि नवविवाहित बेटियों को उनके मायके बुलाया जाता है। रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले होने के कारण यह समय भावनात्मक रूप से भी खास होता है। इस दौरान बेटी अपने ससुराल से कुछ दिन मायके में रहकर परिवारजनों और सहेलियों से मिलती है, जिससे घर का माहौल उत्सव जैसा हो जाता है। बहनों को उपहार भी भेजे जाते हैं और मानदानों (सम्मानित मेहमानों) को बुलाकर पारंपरिक भोजन भी कराया जाता है।

धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व
हरियाली अमावस्या का सीधा संबंध भगवान शिव और श्रीहरि विष्णु की उपासना से जुड़ा है। सावन माह की इस अमावस्या को प्रकृति की समृद्धि और वर्षा ऋतु के आगमन के रूप में भी देखा जाता है। यही वह समय होता है जब खेतों में हरियाली लहलहाने लगती है और किसानों के चेहरों पर उम्मीदों की रौनक लौट आती है।

संस्कृति की विरासत, जिसे सहेजना जरूरी
‘हरि ज्योति’ परंपरा सिर्फ एक पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। आज जब आधुनिकता के चलते कई पारंपरिक रीति-रिवाज पीछे छूटते जा रहे हैं, ऐसे में इस तरह की लोक परंपराओं को बचाए रखने की सख्त जरूरत है। यह न सिर्फ धार्मिक आस्था को मज़बूत करता है, बल्कि पर्यावरण और जैविक जीवनशैली को भी बढ़ावा देता है।

इस तरह हरियाली अमावस्या के मौके पर ‘हरि ज्योति’ की यह परंपरा एक बार फिर से गांवों को जगमग कर गई। गीत-संगीत, सजावट, धार्मिकता और आपसी मेल-मिलाप के इस पर्व को देखकर लगता है कि आज भी हमारे गांवों में लोकसंस्कृति की जड़ें मजबूत हैं, जिन्हें अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।

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