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जब शिक्षक ही अनजान हों तो बच्चों का भविष्य कौन संवारे? बलरामपुर से आई चौंकाने वाली तस्वीर

बलरामपुर जिले के एक सरकारी स्कूल से आई वीडियो ने सबको चौंका दिया है। शिक्षक न तो जिला कलेक्टर का नाम जानते हैं और न ही सामान्य अंग्रेजी शब्द लिख पा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों को सही शिक्षा कैसे मिलेगी? अब जरूरत है शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, निगरानी बढ़ाने और जवाबदेही तय करने की।

On: July 24, 2025 8:08 PM
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विजय सिंह बलरामपुर, छत्तीसगढ़। कभी कहा जाता था कि “गुरु बिन ज्ञान नहीं”, लेकिन जब गुरु ही अज्ञानता की मिसाल बन जाएं तो सवाल उठना लाजमी है। बलरामपुर जिले के कुसमी विकासखंड से आई एक शर्मनाक तस्वीर ने सरकारी स्कूलों की हकीकत को एक बार फिर उजागर कर दिया है। यह मामला प्राथमिक शाला घोड़ासोत और एक अन्य स्कूल से जुड़ा है, जहां के शिक्षकों की जानकारी और शैक्षणिक योग्यता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक वायरल वीडियो में शिक्षकों से कुछ बेहद सामान्य सवाल पूछे गए, जिनका वे जवाब तक नहीं दे पाए।

सवाल पूछे गए… लेकिन जवाब नदारद
पहले शिक्षक से पूछा गया – “जिला कलेक्टर का नाम क्या है?”
लेकिन शिक्षक चुप रहे। फिर पूछा गया – “जिला शिक्षा अधिकारी का नाम बताइए?”
यहां भी कोई जवाब नहीं मिला।

दूसरे शिक्षक से जब अंग्रेजी के कुछ सामान्य शब्द – Eleven, Eighteen, Nineteen – लिखने को कहा गया, तो वे न केवल गलत वर्तनी में लिखते दिखे, बल्कि उन्हें यह तक समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखना है।

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि वे अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की आस में स्कूल भेजते हैं, लेकिन जब शिक्षक ही इतनी बुनियादी जानकारी से अंजान हों तो भरोसा कैसे करें?
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई का स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है और इसकी सबसे बड़ी वजह शिक्षक की लापरवाही और शिक्षा विभाग की कमजोर निगरानी है।

2024-25 में बढ़ीं शिकायतें, लेकिन कार्रवाई नदारद
बलरामपुर जिले के कई प्राथमिक स्कूलों में 2024-25 के दौरान शिक्षकों की दक्षता को लेकर लगातार शिकायतें सामने आई हैं।

बच्चों के सीखने की दर में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

शिक्षा विभाग की ओर से नियमित निरीक्षण नहीं हो रहे।

शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में है।

क्या सिर्फ नियुक्ति से बनता है शिक्षक?
यह सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी सच्चाई है। सवाल यह है कि क्या केवल शिक्षकों की नियुक्ति कर देने से शिक्षा सुधर सकती है? क्या ऐसे शिक्षकों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?

सरकार लाखों-करोड़ों रुपये की योजनाएं चलाती है, स्मार्ट क्लास से लेकर टैबलेट तक बांटे जाते हैं, लेकिन जब शिक्षक ही बुनियादी जानकारी नहीं रखते, तो उन संसाधनों का क्या फायदा?

समाधान क्या है?
अब वक्त आ गया है कि केवल योजनाओं और नियुक्तियों पर ही ध्यान न देकर, प्रभावी निगरानी, नियमित शिक्षक प्रशिक्षण, और शिक्षकों की योग्यता का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाए।
अगर राष्ट्र निर्माण की नींव कमजोर है, तो ऊपर खड़ा महल भी कभी भी गिर सकता है।

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