छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व हरियाली अमावस्या के दिन विधिवत रूप से शुरू हो गया है। मां दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में पाट जात्रा पूजा के साथ इसकी शुरुआत हुई। यह पर्व ना केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में अपनी परंपरा और अनोखे रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है। इस बार यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलने वाला है, जिसमें श्रद्धा, भक्ति और लोक परंपराओं की झलक देखने को मिलेगी।
क्या है पाट जात्रा?
बस्तर दशहरा की शुरुआत पाट जात्रा पूजा विधान से होती है। इसमें रथ निर्माण के लिए जरूरी औजारों की पूजा की जाती है। मां दंतेश्वरी के चरणों में इन औजारों को अर्पित कर परंपरागत तरीके से पूजा-अर्चना की जाती है। इसे बस्तर दशहरा का पहला और बेहद पवित्र चरण माना जाता है।
जनप्रतिनिधियों और पारंपरिक समुदायों की रही भागीदारी
पाट जात्रा पूजा में बस्तर सांसद एवं दशहरा समिति अध्यक्ष महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण देव, महापौर संजय पांडे, कलेक्टर हरिस एस., अपर कलेक्टर सीपी बघेल सहित जिला प्रशासन के अधिकारी शामिल हुए। इसके अलावा मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी-गायता, पटेल, नाईक-पाईक, सेवादारों और भारी संख्या में स्थानीय श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने माहौल को भक्ति और उल्लास से भर दिया।
परंपराओं और तिथियों का सिलसिला
बस्तर दशहरा पर्व में हर पूजा विधान की अपनी खास परंपरा और तिथि निर्धारित होती है। इस वर्ष प्रमुख पूजाएं इस प्रकार रहेंगी:
5 सितम्बर (शुक्रवार): डेरी गड़ाई पूजा
21 सितम्बर (रविवार): काछनगादी पूजा
22 सितम्बर (सोमवार): कलश स्थापना
23 सितम्बर (मंगलवार): जोगी बिठाई पूजा
24 से 29 सितम्बर: नवरात्रि पूजन और रथ परिक्रमा
29 सितम्बर (सोमवार): बेल पूजा
30 सितम्बर (मंगलवार): महाअष्टमी और निशा जात्रा
1 अक्टूबर (बुधवार): कुंवारी पूजा, जोगी उठाई, मावली परघाव
2 अक्टूबर (गुरुवार): भीतर रैनी पूजा
3 अक्टूबर (शुक्रवार): बाहर रैनी पूजा
4 अक्टूबर (शनिवार): काछन जात्रा और मुरिया दरबार
5 अक्टूबर (रविवार): कुटुम्ब जात्रा व ग्राम देवी-देवताओं की विदाई
7 अक्टूबर (मंगलवार): मावली माता की डोली विदाई – समापन
क्यों है बस्तर दशहरा खास?
बस्तर दशहरा पर्व की खास बात यह है कि यह भगवान राम या रावण वध से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह मां दंतेश्वरी देवी को समर्पित पर्व है। यहां की अनोखी परंपराएं, आदिवासी संस्कृति और श्रद्धा मिलकर एक ऐसा धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेल बनाते हैं जो देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है।
सांस्कृतिक विरासत का उत्सव
बस्तर दशहरा न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय परंपराएं, लोककला, और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी है। यहां होने वाली पूजा विधानों में स्थानीय देवी-देवताओं की बड़ी भूमिका होती है, जो इस उत्सव को पूरी तरह बस्तर की मिट्टी से जोड़ती है।