कांकेर, 23 जुलाई 2025
कृषि में नवाचार और परंपरा का संगम देखने को मिला कांकेर जिले के ग्राम मरकाटोला में, जहां पशु शक्ति चालित बियासी यंत्र (हल) पर एक विशेष प्रशिक्षण सह-प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना और कृषि विज्ञान केंद्र कांकेर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ, जिसका उद्देश्य किसानों को खेती में आधुनिक तकनीक से जोड़ना और उनकी मेहनत, समय और संसाधनों की बचत करना था।
कार्यक्रम के मुख्य प्रशिक्षक डॉ. वी. राम विक्टर, प्रधान वैज्ञानिक, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के प्रक्षेत्र यंत्र एवं शक्ति अभियांत्रिकी विभाग से थे। उन्होंने किसानों को बताया कि धान की छिड़काव पद्धति से रोपाई के बाद जब पौधे लगभग 14 से 15 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक बढ़ जाते हैं, तब खरपतवार नियंत्रण की प्रक्रिया जरूरी होती है। आमतौर पर इसे देशी हल से किया जाता है, लेकिन इसमें अधिक श्रम और समय लगता है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए पशु शक्ति चालित बियासी यंत्र एक प्रभावशाली विकल्प बनकर सामने आया है। डॉ. विक्टर ने बताया कि इस यंत्र का उपयोग करने से परंपरागत विधियों की तुलना में समय और श्रम की बड़ी मात्रा में बचत होती है। यह यंत्र पशुओं की मदद से चलता है और खेतों में बियासी की प्रक्रिया को ज्यादा प्रभावी और सरल बनाता है।
इस मौके पर वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र ने बताया कि यह यंत्र पौधों को कम नुकसान पहुंचाता है और बियासी के बाद पौधों की जड़ों का विकास बेहतर तरीके से होता है, जिससे पैदावार में भी इजाफा होता है। उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि बियासी यंत्र की मदद से किसान अपनी खेती को और ज्यादा उन्नत बना सकते हैं।
कार्यक्रम में वैज्ञानिक डॉ. आशीष श्रीवास्तव और डॉ. अखिलेश चंद्राकर भी मौजूद रहे। उन्होंने किसानों को यंत्र की तकनीकी बारीकियों और रखरखाव के बारे में विस्तार से जानकारी दी। किसान मितान चित्रसेन सोनकर और ग्राम सरपंच पदुम ठाकुर की भी उपस्थिति रही, जिन्होंने ग्रामीणों को नई तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
इस आयोजन में ग्राम मरकाटोला के बड़ी संख्या में ग्रामीण और किसान शामिल हुए। सभी ने यंत्र की कार्यप्रणाली को नजदीक से देखा और इसके उपयोग की संभावनाओं पर चर्चा की। किसानों ने इस यंत्र को उपयोगी और व्यावहारिक बताते हुए इसे जल्द से जल्द अपनाने की बात कही।
इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से किसानों को कृषि में आधुनिक तरीकों की जानकारी मिलती है, जिससे न केवल उनकी उपज में बढ़ोतरी होती है, बल्कि मेहनत और संसाधनों की भी बचत होती है। कृषि विज्ञान केंद्र कांकेर का यह प्रयास निश्चित ही किसानों को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।