साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में आज एक बेहद ज्ञानवर्धक और ऐतिहासिक व्याख्यान का आयोजन हुआ, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के ईस्ट एशियन स्टडीज विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नबीन कुमार पाण्डा ने जापान में बौद्ध धर्म के विकास पर विस्तार से जानकारी दी।
प्रो. पाण्डा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए बताया कि जापान में बौद्ध धर्म की शुरुआत 552 ईस्वी में कोरिया के राजा सूंग द्वारा हुई थी। उस समय सोगा वंश ने बौद्ध धर्म को समर्थन दिया और यहीं से इसकी जड़ें जापान में गहरी होती चली गईं। उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, साहित्यिक और स्थापत्य कला के स्तर पर भी जापान को प्रभावित करता रहा है।
बोधिसेन और जापान का संबंध
प्रो. पाण्डा ने एक महत्वपूर्ण भारतीय भिक्षु बोधिसेन का भी ज़िक्र किया, जिन्होंने जापान में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने यह भी बताया कि दुनिया का सबसे पहला उपन्यास भी जापानी भाषा में एक महिला ने 11वीं सदी में लिखा था, जिसमें बौद्ध सोच और जीवनदर्शन की छाप देखी जा सकती है।
तोरी द्वार और भारतीय वास्तुकला में समानता
अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय तोरण द्वार और जापानी ‘तोरी’ द्वार की तुलना करते हुए बताया कि दोनों ही संस्कृति में यह द्वार धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के प्रतीक हैं, जो प्रसिद्ध भवनों या मंदिरों के मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में उपयोग होते हैं।
जापान में बौद्ध धर्म के संप्रदाय और विकास की झलक
प्रो. पाण्डा ने व्याख्यान के दौरान जापान में बौद्ध धर्म के अलग-अलग रूपों और उनकी विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला:
नारा काल में बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण मिला और यह संस्थागत रूप में विकसित हुआ।
झेन बौद्ध धर्म, जो ध्यान और अनुशासन को सबसे ऊपर रखता है, चीन के महायान परंपरा से प्रभावित है।
शिंगोन संप्रदाय में मंत्र और ध्यान के माध्यम से बोधि प्राप्ति की साधना की जाती है।
निचिरन संप्रदाय में ‘लोटस सूत्र’ के माध्यम से भगवान बुद्ध के दिव्य स्वरूप की स्तुति की जाती है। यह आज जापान का सबसे बड़ा बौद्ध संप्रदाय माना जाता है।
प्योर लैंड बौद्ध धर्म ने आम लोगों के लिए मोक्ष का सरल मार्ग प्रस्तुत किया।
कुलपति का विचार
कार्यक्रम की बागडोर संभालते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने कहा
“बौद्ध धर्म की सबसे खास बात यह है कि यह बहुत ही समावेशी और सबको अपनाने वाला है। वह जहां भी गया, वहां की स्थानीय संस्कृति में घुल-मिल गया। थेरवाद और महायान जैसी परंपराएं इसका अच्छा उदाहरण हैं, जिन्होंने बुद्ध की भक्ति और गहरे आध्यात्मिक विचारों को लोगों तक पहुँचाया।”
आभार और आयोजन की सराहना
कार्यक्रम के समापन पर कुलसचिव और अधिष्ठाता प्रो. नवीन कुमार मेहता ने अपने विचार रखते हुए कहाकि, “प्रो. पाण्डा ने हमारे छात्रों और शोधकर्ताओं को जापान सहित पूरे पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझने का सुनहरा मौका दिया।”
अंतरराष्ट्रीय बौद्ध अध्ययन स्कूल और बौद्ध दर्शन विभाग के प्रमुख डॉ. संतोष प्रियदर्शी ने इस व्याख्यान को बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र में एक नई दिशा में उठाया गया अहम कदम बताया।
कार्यक्रम का संचालन चीनी भाषा विभाग के शोधार्थी संतोष कुमार ने बहुत ही संयमित और प्रभावशाली ढंग से किया।