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अनदेखी से अपना वजूद खो रहा लखनऊ का ऐतिहासिक बख्शी का तालाब UPNEWS

लखनऊ का ऐतिहासिक बख्शी का तालाब अपनी खूबसूरती और गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक रहा है। त्रिपुरचंद्र बख्शी द्वारा बनवाया गया यह शाही तालाब अब लापरवाही और अनदेखी से बदहाल हो चुका है। लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद तालाब सूखा है और धरोहर धीरे-धीरे मिट रही है।

On: August 16, 2025 7:27 PM
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लखनऊ सिर्फ नवाबों, इमामबाड़ों और तहज़ीब के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहां की छोटी-छोटी ऐतिहासिक धरोहरें भी कमाल की कहानियां समेटे हुए हैं। इन्हीं में से एक है बख्शी का तालाब, जो कभी लोगों की ज़िंदगी और उनकी संस्कृति का अहम हिस्सा हुआ करता था।

आज यह तालाब अपनी पहचान और वजूद खोने के कगार पर है। जिस तालाब ने एक अनजानी जगह को नाम और पहचान दी, उसी को बचाने की फिक्र किसी जनप्रतिनिधि या विभाग को नहीं है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी तालाब बदहाल है।

इतिहास की झलक – कैसे बना बख्शी का तालाब?

कहा जाता है कि अवध के वजीर त्रिपुरचंद्र बख्शी ने 1226-1236 हिजरी (लगभग 1805 के आसपास) में इस तालाब का निर्माण कराया था। उस दौर में राजधानी लखनऊ से दिल्ली जाने वाला रास्ता “शाही गलियारा” कहलाता था, जो आज का राष्ट्रीय राजमार्ग 24 है।

बख्शी ने इस तालाब को सिर्फ पानी जमा करने की जगह नहीं, बल्कि एक शाही ठिकाना बनाने का सपना देखा। चारों ओर खूबसूरत बाग, बुर्जियां और घाट बनवाए गए। यहां जनाना घाट, मर्दाना घाट, पत्थर घाट और गऊ घाट बनाए गए ताकि हर किसी की सुविधा हो सके।

तालाब इतना गहरा बनाया गया कि बरसात और प्राकृतिक स्रोतों से यह हमेशा पानी से लबालब रहता था। महिलाओं के लिए खास तौर पर जनाना हमाम भी बनवाया गया था। यही नहीं, तालाब के किनारे बांके बिहारी मंदिर और शिव मंदिर भी बनवाए गए। यह जगह हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल बन गई।

नाम से पहचान तक

तालाब बनने के बाद इस जगह का नाम ही बदल गया। लोग इसे बख्शी का तालाब कहने लगे। धीरे-धीरे यही नाम यहां की पहचान बन गया। आज सिर्फ तालाब ही नहीं, बल्कि विधानसभा क्षेत्र, तहसील, ब्लॉक, नगर पंचायत, रेलवे स्टेशन और डाकखाना भी इसी नाम से जाने जाते हैं।

यानी जिस तालाब ने एक छोटे से कस्बे को पहचान दी, आज वही अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है।

तालाब की मौजूदा हालत – खेल के मैदान जैसा दृश्य

समय बदला और हालात भी। जिस तालाब की गहराई कभी पानी से लबालब रहती थी, आज वहां धूल उड़ रही है। चारों ओर फैली हरियाली और बागों की जगह अब कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए हैं।

पर्यटन विभाग ने कुछ साल पहले तालाब को संवारने की कोशिश की थी। करोड़ों रुपये खर्च कर लाल पत्थर, रंगीन फव्वारे और बड़े नलकूप लगाए गए। लेकिन घटिया काम और लापरवाही ने सब चौपट कर दिया।

फव्वारे कुछ ही समय में बंद हो गए।

पत्थर टूटने लगे।

नलकूप की खराब गुणवत्ता के कारण तालाब में पानी ही नहीं भरा।

आज हालत यह है कि तालाब खेल के मैदान जैसा दिखता है।

नेताओं की उदासीनता और जनता की नाराज़गी

बीकेटी विधानसभा का इतिहास भले ही गौरवशाली रहा हो, लेकिन यहां चुने गए सांसद और विधायक कभी भी धरोहर बचाने के लिए गंभीर नहीं हुए। हर बार चुनावी घोषणापत्र में पर्यटन और विरासत की बातें तो होती हैं, लेकिन अमल में कुछ नहीं आता।

लोगों का कहना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि ने तालाब को बचाने की सुध नहीं ली। नतीजा यह है कि बख्शी का तालाब, जो कभी क्षेत्र की शान था, अब उपेक्षा का शिकार है।

बख्शी का तालाब – सिर्फ तालाब नहीं, भावनाओं से जुड़ा नाम

यह तालाब सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और पहचान है। आसपास के लोग इससे भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। शादी-ब्याह, त्योहार और सामाजिक कार्यक्रमों में कभी यही तालाब केंद्र बिंदु हुआ करता था। यहां की बारादरियां अब विलुप्त हो चुकी हैं। बुर्जियां टूट चुकी हैं। तालाब का पानी सूख चुका है। लेकिन लोगों की यादें और उनकी उम्मीदें आज भी इससे जुड़ी हैं।

क्या इसे बचाया जा सकता है? सवाल यही है कि आखिर बख्शी का तालाब को बचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या पर्यटन विभाग इसे फिर से संवार पाएगा? क्या जनप्रतिनिधि इसकी सुध लेंगे? क्या जनता खुद आगे आकर इस धरोहर को बचाने की मुहिम शुरू करेगी? अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह तालाब सिर्फ किताबों और कहानियों में ही रह जाएगा।

पर्यटन का हब बन सकता है बख्शी का तालाब

अगर सरकार और स्थानीय प्रशासन ध्यान दें तो यह तालाब फिर से पर्यटन स्थल बन सकता है। यहां घूमने के लिए पार्क, नौकायन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और फव्वारे लगाए जा सकते हैं। साथ ही बांके बिहारी मंदिर और शिव मंदिर को जोड़कर इसे धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। इससे न सिर्फ धरोहर बचेगी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

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अजय सिंह चौहान लखनऊ

अजय सिंह चौहान – एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार अजय सिंह चौहान लखनऊ (उत्तर प्रदेश) निवासी एक वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में पिछले ढाई दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है। वर्ष 2009 में उन्होंने आगरा से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे निरंतर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे और उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लखनऊ जिले के संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। अपने 25 वर्षों के व्यापक अनुभव के दौरान अजय सिंह चौहान ने जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग, जनहित से जुड़े मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों को मजबूती से उठाया। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा न मानकर, समाज सेवा का सशक्त माध्यम माना और हमेशा निष्पक्ष, निर्भीक व जनपक्षधर लेखन को प्राथमिकता दी। वर्तमान में अजय सिंह चौहान मध्य प्रदेश के प्रमुख हिन्दी दैनिक स्वदेश के लखनऊ संस्करण में ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखन शैली, अनुभव और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल एक कुशल पत्रकार, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बना दिया है।

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