Bhagwati Singh’s Birth Anniversary लखनऊ के उत्तरधौना गांव में जन्मे समाजवादी संत बाबू भगवती सिंह का जीवन सच्चे मायनों में जनता की सेवा को समर्पित रहा। लोग उन्हें मंत्रीजी कहकर पुकारते थे, लेकिन उनकी पहचान केवल पद और राजनीति तक सीमित नहीं थी। उनका जीवन गरीब, मजदूर, किसान, दलित और वंचित वर्ग की आवाज उठाने के लिए समर्पित रहा।
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26 अगस्त को उनकी 93वीं जयंती के अवसर पर उन्हें याद करना, समाजवादी आंदोलन और सिद्धांतवादी राजनीति की एक मिसाल को याद करना है।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
भगवती सिंह का जन्म लखनऊ के उत्तरधौना गांव में ननिहाल में हुआ, लेकिन उनकी परवरिश और शिक्षा अर्जुनपुर व मटियारी में हुई। उनके पिता पृथ्वीपाल सिंह पुलिस में सिपाही थे और सीतापुर में तैनात रहते थे। साधारण परिवार से आने वाले भगवती सिंह ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों में रुचि लेनी शुरू कर दी थी।
1952 में जब आजाद भारत का पहला आम चुनाव हो रहा था, तभी उन्होंने राजनीति की ओर कदम बढ़ाया। सोशलिस्ट पार्टी के नेता रामसागर मिश्र के संपर्क में आए और वहीं से उनके जीवन की दिशा तय हो गई।
संघर्ष से राजनीति में पहचान
पुलिस सिपाही के बेटे से लेकर विधायक, एमएलसी, सांसद और कई बार मंत्री बनने तक का सफर आसान नहीं था। लेकिन भगवती सिंह की ईमानदारी और मेहनत ने उन्हें राजनीति में अलग पहचान दिलाई।
उन्होंने कभी निजी संपत्ति या उद्योग-धंधा नहीं बनाए। सत्ता में कई बार रहने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार के लिए जमीन-मकान तक नहीं खरीदा। उनका कहना था कि नेता का कर्तव्य जनता की सेवा करना है, न कि निजी संपत्ति जोड़ना।
समाजवादी विचारधारा से आजीवन जुड़े रहे
भगवती सिंह ने डॉ. राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और पंडित जनेश्वर मिश्र जैसे समाजवादी विचारकों की संगत में समाजवाद के रास्ते को चुना। किसान नेता चौधरी चरण सिंह, मोहन सिंह और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन किए।
कई बार जेल भी गए, भूखे पेट पद यात्राएं कीं, धरनों और प्रदर्शनों में भाग लिया। उनका पूरा जीवन समाजवादी आंदोलन की मजबूती में बीता।
बीकेटी और महोना क्षेत्र में विकास के कार्य
भगवती सिंह का नाम बीकेटी विधानसभा और महोना क्षेत्र के विकास से हमेशा जोड़ा जाएगा। उन्होंने ग्रामीण और शहरी विकास में कई ऐतिहासिक काम किए, जिनमें शामिल हैं –
बख्शी का तालाब को तहसील का दर्जा दिलाना, सीबी गुप्त कृषि महाविद्यालय की स्थापना, बीकेटी इंटर कॉलेज, कुम्हरावा इंटर कॉलेज और राष्ट्रपति स्मारक इंटर कॉलेज का कायाकल्प ,गोमती नदी पर बसहरी घाट और मंझी घाट पुल का निर्माण, मां चंद्रिका देवी मंदिर और ऐतिहासिक बक्सीताल का पर्यटन स्थल के रूप में विकास ,महोना और इटौंजा को टाउन एरिया का दर्जा ,सैरपुर व बेहटा में राजकीय इंटर कॉलेज की स्थापना
इन कार्यों ने न केवल बीकेटी बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को भी नई दिशा दी।
सिद्धांतों से समझौता नहीं किया
भगवती सिंह राजनीति में ऐसे नेता रहे जिन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वह हमेशा मानते थे कि सत्ता साधन है, साध्य नहीं। उनका जीवन उदाहरण है कि कैसे बिना निजी लाभ के भी राजनीति में जनसेवा को सर्वोपरि रखा जा सकता है।
अंग्रेजों की मूर्तियां हटाने का आंदोलन
आजादी के बाद चौक-चौराहों पर लगी अंग्रेजों की मूर्तियां हटाने के आंदोलन में भी वह सबसे आगे रहे। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत में अंग्रेजी हुकूमत के प्रतीकों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
ईमानदारी का अनोखा उदाहरण
भगवती सिंह की ईमानदारी का किस्सा आज भी याद किया जाता है। 1999 में जब वे लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे, तो पार्टी ने उन्हें छह लाख रुपये दिए और चंदे से भी उतनी ही रकम जुटी। चुनाव खत्म होने के बाद जब हिसाब-किताब किया तो 2.65 लाख रुपये बच गए।
उन्होंने यह पूरी रकम एक अटैची में रखकर सपा मुख्यालय जाकर वापस जमा कर दी। मुलायम सिंह यादव खुद हैरान रह गए और बोले –
“यह पहला मौका है जब कोई उम्मीदवार चुनाव की बची रकम वापस कर रहा है।”
यह घटना उनकी ईमानदारी का सबसे बड़ा सबूत है।
जनता के लिए जीया जीवन
भगवती सिंह ने गरीब, मजदूर, किसान, दलित और पिछड़े वर्ग की आवाज को हमेशा बुलंद किया। चाहे सत्ता में रहे या विपक्ष में, उनकी प्राथमिकता हमेशा जनता ही रही।
उनकी सोच थी – “नेता वही जो जनता के दुख-दर्द में साथ खड़ा हो।”
समाजवाद की जीवित प्रतिमा
भगवती सिंह सिर्फ नेता नहीं, बल्कि समाजवादी आंदोलन की जीवित प्रतिमा थे। उन्होंने अंतिम समय तक प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का समर्थन किया और डॉ. लोहिया के विचारों को जिंदा रखा।
उनका जीवन आज की राजनीति के लिए भी प्रेरणा है कि कैसे बिना समझौते और निजी लालच के भी राजनीति की जा सकती है।
हर साल मनाई जाती है जयंती
26 अगस्त को हर साल उनकी जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। यह केवल एक नेता को याद करना नहीं बल्कि समाजवादी विचारधारा और सिद्धांतवादी राजनीति का सम्मान करना है।