रायसेन। मध्यप्रदेश के Raisen ज़िले में जनसुनवाई के दौरान मंगलवार को एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए। ग्राम सांचेत निवासी सौ फीसदी विकलांग बुजुर्ग जीवन सिंह विश्वकर्मा अपनी पीड़ा लेकर अधिकारियों के सामने पहुंचे। उनकी मांग ऐसी थी, जिसे सुनकर प्रशासन के बड़े अधिकारी भी असमंजस में पड़ गए।
(In the public hearing of Raisen district, a 100% disabled elderly person made a unique demand from the administration. He said that he should be given such a certificate, So that they can meet any officer or minister directly without waiting. This old man who has been wandering for years for PM housing has exposed the insensitivity of the government and administration.)
जीवन सिंह ने कहा –
“मैं पूरी तरह विकलांग हूं, चल-फिर नहीं सकता। जब किसी अधिकारी या मंत्री से मिलने जाता हूं तो मुझे घंटों खड़ा कर इंतज़ार करवाया जाता है। मैं मंत्री के पीछे-पीछे भाग नहीं सकता। इसलिए मुझे ऐसा प्रमाणपत्र बना दीजिए जिसे दिखाकर मैं किसी भी अधिकारी या मंत्री से तुरंत मिल सकूं। कोई मुझे रोक न सके।”
अफसरों के लिए मुश्किल खड़ी कर दी दिव्यांग ने
जीवन सिंह का आवेदन सुनते ही जनसुनवाई में मौजूद अधिकारी चुप्पी साध गए। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसी मांग का क्या जवाब दिया जाए। एडीएम मनोज उपाध्याय ने किसी तरह उन्हें अपने पास बैठाकर समझाया और आश्वासन दिया कि उनकी समस्या पर विचार किया जाएगा। लेकिन यह आश्वासन उस बुजुर्ग की रोज़ की जद्दोजहद और अपमान को हल कर पाएगा या नहीं, यह सवाल अब भी बना हुआ है।
पीएम आवास के लिए सालों से धक्के खा रहा है बुजुर्ग
जीवन सिंह ने बताया कि वह प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास पाने के लिए सालों से संघर्ष कर रहा है। कई बार अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन हर बार सिर्फ “आवास मिलेगा” का झूठा वादा सुनने को मिला। किसी ने आज तक उसकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया।
उनका कहना है कि जब वह अधिकारियों के पास जाते हैं तो उन्हें पागल समझकर टाल दिया जाता है। यह स्थिति प्रशासन की संवेदनहीनता को साफ दर्शाती है।
सिस्टम पर कड़ा सवाल – क्या दिव्यांग की कोई सुनवाई नहीं?
यह मामला प्रशासन और सरकार दोनों पर सवाल खड़ा करता है। आखिरकार एक सौ फीसदी विकलांग बुजुर्ग को अपनी बुनियादी ज़रूरत के लिए सालों तक क्यों भटकना पड़ रहा है? क्या हमारे सिस्टम में दिव्यांग नागरिकों के लिए कोई प्राथमिकता नहीं है?
जनसुनवाई जैसे कार्यक्रम का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना होता है, लेकिन जब जनता वहां भी निराश लौटे तो यह शासन-प्रशासन की नाकामी को उजागर करता है।
दिव्यांग की आवाज़ – “मुझे अधिकार चाहिए, भीख नहीं”
जीवन सिंह की मांग यह नहीं थी कि उन्हें कोई विशेष सुविधा मुफ्त में दी जाए, बल्कि उनकी गुहार साफ थी – “मुझे वह प्रमाणपत्र दो जिससे मैं अधिकारी और मंत्री से बिना अपमानित हुए सीधे मिल सकूं।”
उनका दर्द हर उस आम आदमी का दर्द है जो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है और फाइलों की धूल में दब जाता है।
जनता का सवाल – कब सुधरेगा सिस्टम?
रायसेन कलेक्ट्रेट में गूंजा यह मामला अब लोगों की चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग सवाल कर रहे हैं – अगर सौ फीसदी विकलांग इंसान की सुनवाई नहीं हो सकती, तो बाकी आम नागरिकों की क्या उम्मीद की जाए?
प्रशासनिक अफसरों की जिम्मेदारी है कि वे दिव्यांग और बुजुर्ग नागरिकों की समस्याओं को प्राथमिकता दें, लेकिन यहां तस्वीर उलटी दिखाई दे रही है।