जगदलपुर। (Bastar Dussehra) बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा पर्व सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया में अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस पर्व की शुरुआत से पहले होने वाले प्रमुख धार्मिक विधान काछनगादी पूजा का आयोजन इस साल भी पूरे विधि-विधान और पारंपरिक ढंग से किया गया। इस पूजा विधान के दौरान स्थानीय मिरगान समाज की एक कुंवारी कन्या पर सवार होकर काछनदेवी कांटों से बने झूले पर झूलती हैं और पूरे बस्तर दशहरा पर्व को निर्विघ्न सम्पन्न होने का आशीर्वाद देती हैं।
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काछनदेवी ने कांटों के झूले पर दी अनुमति
रविवार को आयोजित काछनगादी रस्म में मिरगान समाज की 10 वर्षीय बच्ची पीहू दास पर सवार होकर काछनदेवी प्रकट हुईं। देवी ने भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर लेटकर दशहरे के आयोजन की अनुमति दी। इस दृश्य को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए और जयकारों से पूरा माहौल गूंज उठा। (Bastar Dussehra)
राजपरिवार के सदस्य, पुजारी और प्रशासनिक अधिकारी देवी से अनुमति लेने पहुंचे थे। जैसे ही देवी ने आशीर्वाद दिया, वहां आतिशबाजी और उत्साह का माहौल बन गया। यह क्षण सभी श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास रहा। (Bastar Dussehra)
प्रमुख लोग रहे मौजूद
काछनगादी पूजा विधान के अवसर पर वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण देव, महापौर संजय पांडे समेत कई जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। इसके साथ ही बस्तर कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी सुंदरराज पी, कलेक्टर हरिस एस, एसपी शलभ सिन्हा और बड़ी संख्या में अधिकारी तथा पारंपरिक समितियों के सदस्य मौजूद थे। (Bastar Dussehra)
बस्तर दशहरा पर्व की विशेषता यही है कि इसमें मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, मेंबर-मेंबरिन, पुजारी-गायता जैसे विभिन्न समाजों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी जाती हैं। इस तरह यह पर्व सामाजिक एकता और समरसता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
काछनगादी रस्म का महत्व
बस्तर दशहरे की शुरुआत काछनगादी रस्म के बिना संभव ही नहीं मानी जाती। मान्यता है कि आश्विन अमावस्या के दिन रण की देवी काछनदेवी एक कुंवारी कन्या के शरीर में प्रवेश करती हैं और कांटों के झूले पर लेटकर पर्व के निर्विघ्न आयोजन की अनुमति देती हैं।
यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसके पीछे यह मान्यता है कि देवी की अनुमति के बिना पर्व शुरू करना अशुभ माना जाता है। यही कारण है कि काछनगादी रस्म पूरे दशहरे का सबसे महत्वपूर्ण और पहला चरण है। (Bastar Dussehra)
परंपरा और उत्साह का संगम
इस अवसर पर पूरे काछनगुड़ी परिसर को फूलों और रोशनी से सजाया गया था। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों के बीच जब देवी ने झूले पर लेटकर आशीर्वाद दिया तो श्रद्धालुओं की खुशी देखते ही बन रही थी। (Bastar Dussehra)
लोगों का मानना है कि देवी के आशीर्वाद से ही बस्तर दशहरा निर्विघ्न रूप से सम्पन्न होता है।
गोल बाजार में रैला देवी की पूजा
काछनगादी पूजा के बाद शाम को जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पारंपरिक पूजा भी विधिवत संपन्न हुई। इसमें भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के साथ-साथ जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और पारंपरिक समितियों के सदस्य शामिल हुए।
पूरे क्षेत्र में पूजा के दौरान भक्तिमय माहौल रहा। रैला देवी की पूजा को बस्तर दशहरे का एक अहम हिस्सा माना जाता है, जो हर साल पूरे उत्साह और परंपरा के साथ आयोजित की जाती है। (Bastar Dussehra)
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बस्तर दशहरा: सिर्फ पर्व नहीं, सामाजिक एकता का प्रतीक
बस्तर दशहरा देश के अन्य हिस्सों के दशहरे से बिल्कुल अलग है। यहां दशहरा सिर्फ बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता, परंपराओं और स्थानीय संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव है। (Bastar Dussehra)
हर समाज और जाति को इस पर्व में अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिलता है। इस तरह बस्तर दशहरा न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है। (Bastar Dussehra)
श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
काछनगादी रस्म और रैला देवी पूजा के अवसर पर हजारों लोग जगदलपुर पहुंचे। स्थानीय लोगों के साथ-साथ प्रदेश और देशभर से आए श्रद्धालुओं ने इस अद्भुत परंपरा को देखा। (Bastar Dussehra)
लोगों का कहना था कि ऐसा दृश्य सिर्फ बस्तर दशहरे में ही देखने को मिलता है, जहां देवी स्वयं आकर पर्व को सफल बनाने का आशीर्वाद देती हैं।
काछनगादी पूजा विधान के साथ अब बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत हो चुकी है। अगले 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व देश का सबसे लंबा और अनूठा पर्व माना जाता है। आने वाले दिनों में यहां रथारोहण, मावली परघाव और अनेक पारंपरिक रस्में देखने को मिलेंगी, जो बस्तर की संस्कृति और परंपरा को जीवंत करती हैं। (Bastar Dussehra)