गोवर्धन (मथुरा)। MathuraGovardhan Puja “तेरे सब संकट कट जाए, तू पूजा कर गोवर्धन की” — इस भावपूर्ण वाक्य को साकार करती श्रद्धा बुधवार को पूरे ब्रज में नजर आई। दीपावली के अगले दिन मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा के अवसर पर गिरिराज महाराज के दर्शन के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी भक्तों का सैलाब उमड़ा।
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संपूर्ण बृज चौरासी कोस क्षेत्र में इस दिन का माहौल अत्यंत भक्ति और उत्साह से भरा रहा। गोवर्धन, मुखारविंद और दानघाटी मंदिरों में भक्तों ने गाय के गोबर से गिरिराज महाराज का रूप बनाया और दूध, दही, शहद, गंगाजल और पंचामृत से भव्य अभिषेक किया। इसके बाद गिरिराज महाराज को छप्पन भोग और अन्नकूट का प्रसाद अर्पित किया गया। MathuraGovardhan Puja
गौड़ीय संप्रदाय और विदेशी भक्तों की छप्पन भोग यात्रा
इस बार की पूजा में खास आकर्षण रहा विदेशी भक्तों और गौड़ीय संप्रदाय के संतों द्वारा निकाली गई शोभा यात्रा। भक्तों ने सजी हुई डलियों में छप्पन भोग का प्रसाद रखकर गिरिराज महाराज की भव्य यात्रा निकाली। मुकुट मुखारविंद मंदिर से भी लगभग 500 स्थानीय महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में यात्रा में शामिल हुए। बृज के गलियों में भक्ति गीतों की गूंज और “जय गिरिराज महाराज की” के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बन गया। MathuraGovardhan Puja
घर-घर में सजे गोबर से बने गिरिराज महाराज
बृज की परंपरा के अनुसार हर घर में इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। भक्तजन इसे फूल, दीपक और रंगोली से सजाते हैं। पूजा के समय कढ़ी-चावल, बाजरे की रोटी, सब्जी और मिठाइयों से भोग तैयार किया जाता है। इसे अन्नकूट प्रसाद कहा जाता है, जो परिवार और पड़ोसियों में प्रेमपूर्वक वितरित किया जाता है। MathuraGovardhan Puja
गोवर्धन पूजा की कथा और महत्व
शास्त्रों के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा रोककर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा, तो देवेंद्र इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रजभूमि पर लगातार बारिश का प्रकोप बरसाया। तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी कन्नी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को सात दिन और सात रात तक उठाए रखा और सभी व्रजवासियों को शरण दी। MathuraGovardhan Puja
इसके बाद ब्रजवासियों ने भगवान का धन्यवाद करते हुए घर-घर में अन्नकूट का भोग लगाया और 56 प्रकार के व्यंजन बनाकर गिरिराज महाराज को अर्पित किया। तभी से इस दिन को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
लोक कथाओं में यह भी कहा जाता है —
“एक रूप से पूजत है दूजे रहे पूजाय,
सहस्त्र पूजा फैलाए के मांग मांग कर खाय।”
अर्थात भगवान स्वयं गिरिराज के रूप में विराजमान होकर भक्तों का भोग स्वीकार करते हैं।
भक्ति में छिपा जीवन का संदेश
गोवर्धन पूजा सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और कृतज्ञता का उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमारी सच्ची शक्ति बाहुबल में नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और भक्ति में होती है। जिस मिट्टी में हम जन्म लेते हैं, जिस जल से जीवन चलता है और जिन पशुओं से अन्न-सहारा मिलता है — वही हमारे सच्चे आराध्य हैं। MathuraGovardhan Puja
भगवान कृष्ण की यह लीला हमें यह संदेश देती है कि हर परिस्थिति में अपने प्रियजनों और समाज की रक्षा करना ही सच्ची भक्ति है। गोवर्धन पूजा हमें यह भी सिखाती है कि हमें प्रकृति, जल, पशु और धरती के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए।
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ब्रज में उमड़ा आस्था का सागर
इस साल गोवर्धन में भक्तों की भारी भीड़ रही। श्रद्धालुओं ने गिरिराज जी की परिक्रमा की, मंदिरों में घंटा-घड़ियालों की गूंज और भजन कीर्तन से पूरा ब्रज क्षेत्र गुंजायमान रहा। विदेशी भक्त पारंपरिक भारतीय वस्त्रों में नजर आए और उन्होंने भी भारतीय रीति-रिवाजों से पूजा की। MathuraGovardhan Puja
भक्तों का मानना है कि गोवर्धन पूजा का यह दिन जीवन में सुख, समृद्धि और संतुलन का प्रतीक है। यह पर्व हर व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि ईश्वर की सच्ची आराधना सेवा, भक्ति और प्रकृति के सम्मान में है। MathuraGovardhan Puja
ब्रज की पवित्र धरती पर मनाया गया गोवर्धन पूजा महोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। गिरिराज महाराज की जयकारों से गुंजित वातावरण में श्रद्धालुओं ने भक्ति और प्रेम का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। MathuraGovardhan Puja