जगदलपुर। Bastar Dussehra विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत होते ही सदियों से निभाई जा रही अनोखी परंपरा ‘जोगी बिठाई’ इस साल भी पूरे विधि-विधान के साथ सम्पन्न हुई। इस रस्म में हल्बा समुदाय के युवक को जोगी बनाकर नौ दिनों तक उपवास और तपस्या करवाई जाती है, ताकि पर्व निर्विघ्न और शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो सके।
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इस वर्ष बड़े आमाबाल के रघुनाथ नाग को जोगी बनाया गया है। वे मंगलवार को सिरहासार भवन में योगासन की मुद्रा में बैठ गए। इस मौके पर जगदलपुर विधायक किरण देव, बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी, नगर निगम अध्यक्ष खेमसिंह देवांगन सहित मांझी, चालकी, नाइक, पाइक और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। Bastar Dussehra
क्या है ‘जोगी बिठाई’ की परंपरा?
करीब 600 साल पुरानी परंपरा मानी जाने वाली यह रस्म हल्बा जाति के पुरुष द्वारा निभाई जाती है। जोगी, पितृमोक्ष अमावस्या के दिन सिरहासार भवन पहुंचता है और दशहरे की शुरुआत के साथ नौ दिनों तक उपवास पर बैठ जाता है। इस दौरान वह सिर्फ फल और दूध का सेवन करता है। Bastar Dussehra
कहा जाता है कि उसकी तपस्या से बस्तर क्षेत्र में शांति बनी रहती है और दशहरा पर्व बिना किसी बाधा के सम्पन्न होता है।
कैसे निभाई जाती है यह रस्म?
जोगी बनने वाले युवक को एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले वह अपने पितरों का श्राद्ध करता है। इसके बाद उसे नए वस्त्र पहनाकर मावली माता मंदिर ले जाया जाता है। यहां तलवार की पूजा की जाती है। तलवार हाथ में लेकर जोगी सिरहासार भवन लौटता है और एक कुंड में योगासन की मुद्रा में बैठ जाता है। Bastar Dussehra
तपस्या के दौरान उसे किसी बुरी नजर से बचाने के लिए चारों तरफ कपड़े का पर्दा लगाया जाता है। नौ दिनों तक वह इसी अवस्था में बैठकर बस्तर की शांति और दशहरा के सफल आयोजन के लिए साधना करता है। Bastar Dussehra
पौराणिक कथा से जुड़ी परंपरा
‘जोगी बिठाई’ से एक रोचक पौराणिक कथा भी जुड़ी है। मान्यता है कि कई साल पहले दशहरा पर्व के दौरान हल्बा समुदाय के एक युवक ने निर्जल उपवास कर तपस्या की थी। जब उस समय के महाराजा को इस बात की जानकारी हुई तो वे स्वयं युवक से मिलने पहुंचे। Bastar Dussehra
युवक ने महाराजा से कहा कि वह यह तपस्या केवल इसलिए कर रहा है ताकि दशहरा पर्व बिना किसी रुकावट के सम्पन्न हो सके। महाराजा उसकी भावना और समर्पण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस स्थान पर सिरहासार भवन का निर्माण करवाया और आदेश दिया कि यह परंपरा हमेशा निभाई जाए। तभी से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है।
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
बस्तर दशहरा एशिया का सबसे लंबा चलने वाला त्योहार माना जाता है। इसकी पहचान सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक है। ‘जोगी बिठाई’ जैसी अनूठी रस्में इस पर्व को और खास बनाती हैं। Bastar Dussehra
लोगों का मानना है कि जब तक जोगी नौ दिनों तक साधना करता है, तब तक बस्तर क्षेत्र सुरक्षित और शांत रहता है। यही वजह है कि श्रद्धालु हर साल बड़ी श्रद्धा और आस्था से इस रस्म का हिस्सा बनते हैं।
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समाज और प्रशासन की भागीदारी
इस परंपरा के आयोजन में सिर्फ धार्मिक विश्वास ही नहीं, बल्कि सामाजिक समन्वय भी दिखता है। बस्तर दशहरा समिति, जनप्रतिनिधि और स्थानीय समुदाय एक साथ मिलकर इस रस्म को सम्पन्न कराते हैं। यही वजह है कि हर साल दशहरा का यह पर्व और भी भव्यता और अनुशासन के साथ सम्पन्न होता है। Bastar Dussehra
‘जोगी बिठाई’ सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर दशहरा की आत्मा कही जा सकती है। यह परंपरा न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करती है, बल्कि समाज को एकजुट कर शांति और समृद्धि का संदेश भी देती है।
आज भी जब जोगी योगासन की मुद्रा में तपस्या करता है, तो हर कोई यही कामना करता है कि बस्तर की धरती हमेशा खुशहाल और शांत बनी रहे। यही इस परंपरा का सबसे बड़ा उद्देश्य है।