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Playing with the lives of patients लखनऊ समेत यूपी में अवैध नर्सिंग होम का मकड़जाल, स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से बढ़ रहा मरीजों का संकट UP2025

Playing with the lives of patients लखनऊ और आसपास के जिलों में अवैध नर्सिंग होम और क्लीनिक धड़ल्ले से चल रहे हैं। गैर-प्रशिक्षित डॉक्टरों के भरोसे इलाज, मनमानी वसूली और मरीजों की मौत पर भी स्वास्थ्य महकमे की सिर्फ खानापूर्ति। आखिर कब होगी कार्रवाई?

On: September 2, 2025 9:26 PM
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Playing with the lives of patients

Playing with the lives of patients लखनऊ शहर ही नहीं, बल्कि राजधानी से सटे गांवों तक अवैध नर्सिंग होम और क्लीनिकों का ऐसा मकड़जाल फैला है जिसने आम जनता की जिंदगी खतरे में डाल दी है। हाल ही में केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर से खदरा के एक निजी अस्पताल में मरीज को भर्ती करवाकर लाखों रुपये वसूले गए, लेकिन इलाज के अभाव में उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में तो आया, मगर कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई।

असलियत यह है कि राजधानी और उसके आसपास के 80 प्रतिशत निजी अस्पताल बिना पंजीकरण और मानकों के खुलेआम चल रहे हैं। इन अस्पतालों में न तो प्रशिक्षित डॉक्टर हैं और न ही बेसिक मेडिकल सुविधाएं, फिर भी मरीजों का इलाज कर भारी वसूली की जाती है। Playing with the lives of patients

जांच सिर्फ दिखावा, कार्रवाई नदारद

स्वास्थ्य विभाग के अफसर इन अस्पतालों के खिलाफ जांच का दावा तो करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर मामलों में नोटिस जारी कर खानापूर्ति कर दी जाती है। इसके बाद कुछ लेन-देन और समझौते के जरिए मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। यही वजह है कि अवैध नर्सिंग होम का कारोबार फल-फूल रहा है। Playing with the lives of patients

सूत्र बताते हैं कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े पैमाने पर अवैध अस्पताल चल पाना मुमकिन ही नहीं है। यही वजह है कि छोटे कस्बों से लेकर राजधानी तक यह धंधा बेखौफ जारी है। Playing with the lives of patients

कमीशन पर चल रहा इलाज का धंधा

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन अस्पतालों तक मरीज पहुंचाने में आशा कार्यकर्ताओं और एम्बुलेंस कर्मियों की भी बड़ी भूमिका है। आशा कार्यकर्ता कमीशन के लालच में मरीजों को अवैध नर्सिंग होम तक ले जाती हैं, भले ही वहां सही इलाज की सुविधा न हो। Playing with the lives of patients

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब प्रसव के दौरान मां और बच्चे दोनों की मौत हो गई, लेकिन अस्पताल संचालकों ने कुछ पैसों और दबाव के जरिए मामला दबा दिया। एम्बुलेंस कर्मी भी कमीशन के चक्कर में मरीजों को इन नर्सिंग होम तक पहुंचाने का काम करते हैं।

मरीजों और परिजनों के साथ लूट

इन अवैध नर्सिंग होम में मरीजों और उनके परिजनों के साथ मनमानी वसूली होती है। मामूली इलाज के लिए भी हजारों रुपये वसूल किए जाते हैं। ऑपरेशन या इमरजेंसी की आड़ में कई बार लाखों रुपये तक की मांग कर दी जाती है।

परिजनों के पास मजबूरी में पैसा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, क्योंकि मरीज की जान बचाना प्राथमिकता होती है। लेकिन पैसे वसूलने के बाद भी इलाज ढंग से नहीं मिलता और कई बार मरीज की मौत हो जाती है। Playing with the lives of patients

किन इलाकों में सबसे ज्यादा सक्रिय अवैध नर्सिंग होम

राजधानी लखनऊ में आईआईएम रोड, सीतापुर रोड, हरदोई रोड, बालागंज, दुबग्गा, बीकेटी, इटौंजा, मलिहाबाद और मोहनलालगंज जैसे इलाके इन अवैध नर्सिंग होम के अड्डे बने हुए हैं। Playing with the lives of patients

यहां तक कि कुछ नर्सिंग होम तो निजी मकानों में ही चल रहे हैं। न कोई ऑपरेशन थिएटर है, न आईसीयू और न ही प्रशिक्षित स्टाफ। इसके बावजूद यहां रोजाना दर्जनों मरीज भर्ती किए जाते हैं। Playing with the lives of patients

क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट की धज्जियां

क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 2010 के तहत हर अस्पताल के लिए कुछ मानक तय किए गए हैं। इनमें प्रशिक्षित डॉक्टर और स्टाफ, बेड की संख्या, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू, ऑक्सीजन सिलेंडर, वेंटीलेटर, साफ-सफाई, बायोवेस्ट मैनेजमेंट और अग्निशमन जैसी बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य हैं। Playing with the lives of patients

लेकिन लखनऊ और उसके आसपास के अधिकांश नर्सिंग होम में इनमें से आधी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। न तो सही डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही जरूरी मेडिकल उपकरण। साफ है कि यह एक्ट सिर्फ कागजों पर ही लागू है। https://dainikhistory.com/

मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़

अवैध नर्सिंग होम का सबसे बड़ा नुकसान मरीजों की जिंदगी को उठाना पड़ता है। यहां इलाज के नाम पर ऐसे लोग बैठे होते हैं जिनके पास न तो मेडिकल डिग्री है और न ही अनुभव। कई बार नर्स और compounder ही डॉक्टर बनकर ऑपरेशन तक कर डालते हैं।

ऐसे में मरीजों की जान पर बन आती है। जच्चा-बच्चा की मौत, ऑपरेशन में लापरवाही या इलाज में गड़बड़ी आम बात हो चुकी है।

https://twitter.com/DainikHistory?t=un2EfdiIG8L5BD8EkPp2qg&s=08

विभाग की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी और लापरवाही ने आम लोगों के बीच अविश्वास पैदा कर दिया है। लोग सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर क्यों प्रशासन और स्वास्थ्य महकमा इन अस्पतालों पर कार्रवाई करने से बचता है। Playing with the lives of patients

क्या विभाग के अधिकारी खुद इस धंधे में शामिल हैं? क्या हर महीने मोटी रकम देकर ये नर्सिंग होम अपने अवैध कारोबार को बचा रहे हैं? Playing with the lives of patients

आखिर कब होगी सख्त कार्रवाई?

लोगों की जिंदगी से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर सरकार और स्वास्थ्य विभाग को तुरंत कदम उठाने होंगे। अवैध नर्सिंग होम और क्लीनिकों पर नकेल कसना बेहद जरूरी है।

सख्त जांच, लाइसेंस निरस्त करना और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई जैसे कदम ही इस गंदे कारोबार को रोक सकते हैं। वरना मरीजों की जिंदगी ऐसे ही दांव पर लगती रहेगी और स्वास्थ्य महकमा सिर्फ कागजी कार्रवाई करता रहेगा।

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अजय सिंह चौहान लखनऊ

अजय सिंह चौहान – एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार अजय सिंह चौहान लखनऊ (उत्तर प्रदेश) निवासी एक वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में पिछले ढाई दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है। वर्ष 2009 में उन्होंने आगरा से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे निरंतर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे और उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लखनऊ जिले के संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। अपने 25 वर्षों के व्यापक अनुभव के दौरान अजय सिंह चौहान ने जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग, जनहित से जुड़े मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों को मजबूती से उठाया। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा न मानकर, समाज सेवा का सशक्त माध्यम माना और हमेशा निष्पक्ष, निर्भीक व जनपक्षधर लेखन को प्राथमिकता दी। वर्तमान में अजय सिंह चौहान मध्य प्रदेश के प्रमुख हिन्दी दैनिक स्वदेश के लखनऊ संस्करण में ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखन शैली, अनुभव और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल एक कुशल पत्रकार, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बना दिया है।

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