आपने सुना होगा ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’। यह बात सच हो गई है एक भारतीय सैनिक के लिए जो हाल ही में एक भयानक दुर्घटना का शिकार हुए थे। वह एक ट्रेन दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गए थे लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया और आज वह सुरक्षित हैं। यह कहानी सिर्फ किस्मत की नहीं है, बल्कि यह कहानी है पूर्व सैनिकों के बीच की एकता और एक-दूसरे के प्रति उनके समर्पण की।
(The miraculous story of DSC jawan Bhupendra Pun who fell from a train in Narmadapuram. Know how he remained safe even after three to four trains passed and the Ex-Servicemen’s sarvopari Kalyan Samiti and the Railways saved his life.)
नासिक से जबलपुर की यात्रा पर निकले डीएससी (मिलिट्री) के जवान भूपेंद्र पुन के साथ एक ऐसी घटना हुई, जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे। नर्मदापुरम के सोहागपुर के पास भूपेंद्र ट्रेन से गिर गए। यह कोई सामान्य गिरना नहीं था, बल्कि वह गिरकर सीधे ट्रेन की पटरियों के बीच आ गए। अगर आप कभी भी ट्रेन की पटरी के पास गए होंगे तो जानते होंगे कि यह कितना खतरनाक होता है।
भूपेंद्र के ऊपर से एक, दो नहीं, बल्कि तीन से चार ट्रेनें गुज़र गईं। आप सोच सकते हैं कि एक इंसान जो पटरियों के बीच पड़ा हो, उसके ऊपर से ट्रेन निकल जाए तो क्या होगा? शायद हम यह सोच भी नहीं सकते। पर भूपेंद्र पुन के साथ यह करिश्मा हुआ। वह पूरी तरह सुरक्षित बच गए। इस दौरान उन्हें चोटें तो आईं लेकिन उनकी जान पर कोई खतरा नहीं आया।
मदद के लिए आगे आए पूर्व सैनिक
जब रेलवे को इस घटना के बारे में पता चला, रेलवे अधिकारियों ने प्राथमिक उपचार के लिए सैनिक को सोहागपुर के अस्पताल में भर्ती कराया जहां से नर्मदा पुरम भेजा गया ओर उन्होंने तुरंत इसकी सूचना सर्वोपरि कल्याण समिति के सदस्यों को दी। यह समिति पूर्व सैनिकों के द्वारा चलाई जाती है और वे एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। समिति की सदस्य नीलम पटेल को जैसे ही खबर मिली, उन्होंने तुरंत अध्यक्ष निर्मल राजपूत और उपाध्यक्ष ओमप्रकाश राणा को इसकी जानकारी दी।
खबर मिलते ही निर्मल राजपूत और ओमप्रकाश राणा नरेंद्रपुरम जिला अस्पताल तुरंत पहुंचे। उन्होंने देखा कि जवान भूपेंद्र बुरी तरह घायल थे।
लेकिन वहां इलाज की कमी के चलते उन्हें सही उपचार नहीं मिल पाया।
इस स्थिति में, कल्याण समिति के दूसरे सदस्यों, किशोर धड़ौरे और सुनील बर्दिया, ने तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने घायल जवान को नर्मदापुरम से सीधे भोपाल के सैनिक अस्पताल में भर्ती कराने का निर्णय लिया। उन्होंने तुरंत एक एंबुलेंस की व्यवस्था की और भूपेंद्र को भोपाल ले गए।
भोपाल के सैनिक अस्पताल में, डॉक्टरों ने तुरंत भूपेंद्र का इलाज शुरू किया। सभी को यही उम्मीद थी कि उनकी हालत खतरे से बाहर हो। डॉक्टरों ने बताया कि वह फिलहाल खतरे से बाहर हैं और उनकी हालत स्थिर है। हालांकि, वह अभी बात नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन उनकी जान बच गई, यह सबसे बड़ी राहत की बात है।
पूर्व सैनिकों का समर्पण
इस पूरी घटना में जिस बात ने सबसे ज्यादा दिल को छुआ, वह थी पूर्व सैनिकों की एकजुटता और एक-दूसरे के प्रति उनकी भावना। उपाध्यक्ष ओमप्रकाश राणा ने बताया कि भूपेंद्र को जब पटरियों के बीच देखा तो उनकी हालत बहुत गंभीर थी। उन्होंने कहा, “यह भगवान का चमत्कार ही है कि दो-तीन ट्रेनें गुजरने के बाद भी वह सुरक्षित रहे।”
गिरने की जानकारी लगते ही राणा ने यह भी बताया कि उन्होंने सुहागपुर रेलवे अधिकारियों से भी बात की, जिन्होंने इस बात की पुष्टि की कि सैनिक सुरक्षित हैं। फिर उनकी समिति ने नर्मदापुरम से भोपाल तक एंबुलेंस की व्यवस्था की और जवान को सही समय पर सही जगह पहुंचाया। यह दिखाता है कि हमारे पूर्व सैनिक अपनी सेवा समाप्त होने के बाद भी देश के जवानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नहीं भूलते। वे हमेशा एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं।
यह घटना हमें सिखाती है कि सच्ची मानवता और समर्पण कभी खत्म नहीं होते। हमारे देश के सैनिक, चाहे वे सेवा में हों या सेवानिवृत्त हो चुके हों, हमेशा एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। भूपेंद्र पुन की यह कहानी हमें ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’ के साथ-साथ यह भी सिखाती है कि जब हम सब मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी मुश्किल आसान हो जाती है।