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UPNEWS गोमती के उफान से किसानों की फसलें डूबीं: अब कैसे होगी भरपाई?

लखनऊ के बीकेटी तहसील के गांवों में गोमती नदी के उफान से धान-उरद की फसलें डूब गईं। किसान मुआवजे और बाढ़ से बचाव के स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।

On: August 20, 2025 10:25 PM
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लखनऊ के बीकेटी तहसील क्षेत्र के अंतर्गत गोमती नदी के किनारे बसे गांवों के किसानों की मेहनत इस बार भी बाढ़ में डूब गई। भारी बारिश और बांधों से छोड़े गए पानी के कारण लासा, सुल्तानपुर, बहादुरपुर, अकड़रिया, दुघरा, जमखनवा समेत दर्जनभर गांवों में खरीफ की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। खेतों में धान और उरद की लहलहाती फसलें अब सिर्फ पानी में डूबी दिखाई देती हैं। किसानों की छह महीने की मेहनत और उम्मीदें गोमती के तेज बहाव में बह गईं।

हर साल की समस्या, कोई स्थायी हल नहीं

स्थानीय किसानों का कहना है कि यह मुसीबत उनके लिए नई नहीं है। हर साल बारिश के मौसम में गोमती नदी उफान पर आ जाती है और बांधों से छोड़े गए पानी के बाद गांव जलमग्न हो जाते हैं। खेती पर पूरी तरह निर्भर किसान बार-बार फसल बर्बादी का सामना करते हैं, लेकिन न तो स्थायी समाधान हुआ है और न ही समय पर मुआवजा मिल पाता है।

लासा गांव के किसान बालकृष्ण बताते हैं, “धान और उरद की फसल अच्छी होने की उम्मीद थी। खाद, बीज और ट्रैक्टर सब उधार पर लिया था। अब सब पानी में डूब गया, चुकाने के लिए कुछ भी नहीं बचा।”

खेत बने टापू, नाव से जाना पड़ रहा खेतों तक

सुल्तानपुर, बहादुरपुर और लासा गांव इस समय टापू जैसे हो गए हैं। खेतों में इतना पानी भर गया है कि किसानों को नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। सब्जियां और कच्ची फसलें खेत में ही सड़ चुकी हैं। निचले इलाकों में तो हालात और भी बदतर हैं, जहां घरों तक पानी घुस आया है।

जमखनवा गांव के उमेश यादव कहते हैं, “हम सालों से इस समस्या का सामना कर रहे हैं। सरकार सर्वे कराए, मुआवजा दे, लेकिन अब तक हमें सही मदद नहीं मिल पाई। हर बार कागजों में वादे होते हैं, जमीनी स्तर पर कुछ नहीं।”

कर्ज के बोझ तले दबे किसान

किसानों की स्थिति इतनी खराब है कि ज्यादातर ने फसल उगाने के लिए बैंक लोन, क्रेडिट कार्ड और उधारी पर भरोसा किया। खाद, डीजल और पोटाश जैसी चीजों की महंगाई ने पहले से ही हालत खराब कर रखी थी। अब फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाने से उनके पास कर्ज चुकाने के लिए कुछ भी नहीं बचा। यही कारण है कि किसान अब सरकार से मुआवजा और कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं।

“फसलें हमारी औलाद जैसी होती हैं”

किसानों का कहना है कि वे अपनी फसलों को औलाद की तरह पालते हैं। बीज से लेकर कटाई तक दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन जब उनकी यह मेहनत पानी में बह जाती है, तो दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि गांवों में किसानों की आंखों में आंसू और दिल में मायूसी साफ दिखाई दे रही है।

किसानों की मुख्य मांगें

तत्काल फसल नुकसान का सर्वे और उचित मुआवजा।

भविष्य में बाढ़ से बचाव के लिए स्थायी समाधान।

किसानों के बैंक लोन और उधारी की माफी।

फसल बीमा योजना को प्रभावी तरीके से लागू करना।

पशुपालन भी प्रभावित, दूध उत्पादन घटा

बाढ़ का असर सिर्फ खेती तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पशुपालकों पर भी पड़ा। चारे की भारी कमी है और जो चारा मिल रहा है, वह पर्याप्त नहीं है। इससे दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन घट गया है। पशुपालन विभाग की ओर से थोड़ी मदद दी जा रही है, लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है।

स्थायी समाधान की दरकार

किसानों का साफ कहना है कि अब सिर्फ मुआवजे से काम नहीं चलेगा। जरूरत है कि सरकार स्थायी उपाय करे ताकि हर साल गोमती का उफान उनकी जिंदगी बर्बाद न करे। बीकेटी तहसील क्षेत्र में हर साल फसलों का नुकसान होना अब खेती को घाटे का सौदा बना रहा है। यही कारण है कि धीरे-धीरे किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह क्षेत्र धीरे-धीरे खेती योग्य नहीं रह पाएगा। कोरोना महामारी के दौरान जब पूरी अर्थव्यवस्था डगमगा गई थी, तब कृषि क्षेत्र ने ही देश को संभाला था। ऐसे में किसानों की अनदेखी करना किसी भी हालत में उचित नहीं है।

सवाल सरकार से

आखिर हर साल किसान ही क्यों छले जाते हैं? कभी कुदरत उन्हें नहीं छोड़ती तो कभी सरकार। अगर योजनाएं हैं, तो उनका असर किसानों तक क्यों नहीं पहुंचता? बाढ़ जैसी समस्या के समाधान के बिना किसान हर बार अपनी मेहनत और उम्मीदों को डूबते देखते रहेंगे।

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अजय सिंह चौहान लखनऊ

अजय सिंह चौहान – एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार अजय सिंह चौहान लखनऊ (उत्तर प्रदेश) निवासी एक वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में पिछले ढाई दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है। वर्ष 2009 में उन्होंने आगरा से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे निरंतर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे और उत्तर प्रदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लखनऊ जिले के संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई। अपने 25 वर्षों के व्यापक अनुभव के दौरान अजय सिंह चौहान ने जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग, जनहित से जुड़े मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों को मजबूती से उठाया। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशा न मानकर, समाज सेवा का सशक्त माध्यम माना और हमेशा निष्पक्ष, निर्भीक व जनपक्षधर लेखन को प्राथमिकता दी। वर्तमान में अजय सिंह चौहान मध्य प्रदेश के प्रमुख हिन्दी दैनिक स्वदेश के लखनऊ संस्करण में ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखन शैली, अनुभव और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल एक कुशल पत्रकार, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बना दिया है।

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