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Tribal dance on leaves: विश्व आदिवासी दिवस पर विकास शांडिल्य का अनोखा लीफ आर्ट, पीपल के पत्तों पर रचा आदिवासी नृत्य CGNEWS

नगरी के लीफ आर्टिस्ट विकास शांडिल्य ने विश्व आदिवासी दिवस पर पीपल के पत्तों पर आदिवासी नृत्य की अनोखी कलाकृति बनाई। डी.के. यादव ने की सराहना और सरकार से प्रोत्साहन की मांग की।

On: August 9, 2025 8:34 PM
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जितेंद्र साहू नगरी (छत्तीसगढ़)। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर सिहावा क्षेत्र के ग्राम मोदे, नगरी के रहने वाले युवा लीफ आर्टिस्ट विकास शांडिल्य ने अपनी अनोखी कला से सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने पीपल के पत्तों पर बारीकी से आदिवासी संस्कृति की झलक उकेरी, जिसे देखने वाला हर व्यक्ति उनकी प्रतिभा का कायल हो गया।

इस विशेष अवसर पर विकास ने पीपल के पत्तों पर आदिवासी महिला नृत्य की एक सुंदर आकृति बनाई। इसमें एक पुरुष मांदर बजाते हुए और दो महिलाएं पारंपरिक नृत्य करते हुए नजर आ रही हैं। इस कलाकृति को उन्होंने ‘तुर्रा’ नाम दिया है, जो स्थानीय बोली में खास महत्व रखता है।

कला को मिली सराहना
विकास शांडिल्य की इस अनूठी कलाकृति की डी.के. यादव, युवा प्रकोष्ठ अध्यक्ष, सर्व यादव समाज सिहावा क्षेत्र ने खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा –

“विकास की यह रचना वाकई प्रशंसनीय है। इस तरह की कला न सिर्फ हमारी संस्कृति को संजोती है, बल्कि इसे नई पहचान और गति भी देती है। सरकार को ऐसे प्रतिभाशाली कलाकारों को पहचान कर प्रोत्साहन देना चाहिए।”

उन्होंने विकास को विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।

पीपल के पत्तों पर कला – एक अनोखी पहचान
लीफ आर्ट (Leaf Art) एक ऐसी कला है जिसमें कलाकार सूखे पत्तों पर नक्काशी या पेंटिंग के जरिए अलग-अलग आकृतियां बनाते हैं। यह कला धैर्य, बारीकी और कल्पना शक्ति की मांग करती है। पीपल का पत्ता अपनी मजबूती और सुंदर आकार की वजह से इस तरह की कला के लिए उपयुक्त माना जाता है।

विकास शांडिल्य ने इस कला में महारत हासिल कर ली है और वे लगातार नई-नई आकृतियों पर काम कर रहे हैं। उनकी यह पहल न सिर्फ कला जगत में अलग पहचान बना रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का काम कर रही है।

विश्व आदिवासी दिवस और कला का संदेश
विश्व आदिवासी दिवस हर साल 9 अगस्त को आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और अधिकारों के सम्मान के लिए मनाया जाता है। इस दिन विकास शांडिल्य का यह कलात्मक तोहफा आदिवासी समाज की जीवंत और रंगीन झलक को दर्शाता है।

उनकी बनाई कलाकृति में मांदर की धुन पर थिरकते कदम और रंग-बिरंगे परिधान में सजी आदिवासी महिलाएं, हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण पेश करती हैं।

सरकारी पहल की जरूरत
स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसे कलाकारों को सरकार की तरफ से मंच और सहायता मिलनी चाहिए, ताकि वे अपनी कला को और आगे ले जा सकें। लीफ आर्ट जैसी पारंपरिक और अनोखी कलाओं को संरक्षित करने के लिए योजनाएं बनाई जानी चाहिए।

डी.के. यादव ने भी कहा कि –

“अगर सरकार ऐसे कलाकारों को चिन्हित कर उनका सम्मान और सहयोग करे, तो यह न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत प्रगति में मदद करेगा, बल्कि हमारी परंपराओं को भी जीवित रखेगा।”

स्थानीय गर्व का विषय
विकास शांडिल्य जैसे युवा कलाकार नगरी और सिहावा क्षेत्र के लिए गर्व का विषय हैं। उनकी कला यह संदेश देती है कि मेहनत, लगन और जुनून से कोई भी कलाकार अपनी रचना को दुनिया तक पहुंचा सकता है।

विश्व आदिवासी दिवस पर पीपल के पत्तों में उकेरी उनकी ‘तुर्रा’ कलाकृति आने वाले समय में इस क्षेत्र की पहचान बन सकती है।

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