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ग्रामीणों की आजीविका संवारने जिला प्रशासन और सेवक मंडल ने बांटा मत्स्य बीज, 102 लाभार्थी हुए शामिल

बस्तर में मछली पालन को बढ़ावा देने जिला प्रशासन और सेवक मंडल ने 102 हितग्राहियों को 272 किलोग्राम मत्स्य बीज का वितरण किया। वैज्ञानिक तरीके से पालन हेतु प्रशिक्षण भी दिया गया। यह पहल ग्रामीण आजीविका और जल संसाधन उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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जगदलपुर, बस्तर। मछली पालन को बढ़ावा देने और ग्रामीणों की आजीविका को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बस्तर में एक सराहनीय पहल की गई। 6 अगस्त 2025 को जिला प्रशासन और जनपद पंचायत के मार्गदर्शन में बस्तर सेवक मंडल, जगदलपुर द्वारा हाई इम्पैक्ट मेगा वाटरशेड 2.0 परियोजना के अंतर्गत मछली पालन विभाग और मनरेगा के सहयोग से कुल 102 ग्रामीण हितग्राहियों को मत्स्य बीज (फिंगरलिंग्स) वितरित किए गए।

यह वितरण शासकीय मत्स्य बीज केंद्र, बालेगा में आयोजित हुआ, जहां मछली निरीक्षक डॉ. लखन ठाकुर के तकनीकी मार्गदर्शन में कुल 272 किलोग्राम फिंगरलिंग का वितरण किया गया। यह बीज कतला, रोहू, मृगल और क्रास कार्प जैसी प्रमुख प्रजातियों का था, जिन्हें 400 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी दर पर लाभार्थियों को दिया गया।

तालाबों में नई उम्मीद की शुरुआत
इस योजना के तहत बस्तर विकासखंड के वे हितग्राही शामिल किए गए, जिनके यहां मनरेगा के तहत डबरी और तालाब पहले से निर्मित हैं। अब इन जल स्त्रोतों का उपयोग मछली पालन के लिए किया जा रहा है, जिससे ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकेगी।

प्रशिक्षण और जागरूकता से होगा बेहतर परिणाम
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों को मछली पालन की तकनीकी जानकारी दी गई। बीज छोड़ने की सही विधि, पालन प्रक्रिया, आहार प्रबंधन, तालाब की तैयारी, जल की गुणवत्ता बनाए रखना, बीमा प्रक्रिया, और KYC जैसी ज़रूरी प्रक्रियाओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

बस्तर सेवक मंडल की ओर से श्री सुनील ठाकुर ने “POP (पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेस)” की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अगर मछली पालन वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो यह स्थायी आजीविका का माध्यम बन सकता है।

उन्होंने बताया कि मछली पालन शुरू करने से पहले तालाब की अच्छी तरह से तैयारी करना जरूरी है। इसके बाद बीज डालने, नियमित आहार देने, जल की गुणवत्ता बनाए रखने और मछलियों की बीमारियों पर नियंत्रण जैसी बातों का ध्यान रखना चाहिए।

स्थानीय स्तर पर रोज़गार की दिशा में ठोस पहल
यह पहल न केवल मछली पालन को बढ़ावा दे रही है, बल्कि गांवों में रोजगार और स्थानीय स्तर पर आर्थिक सशक्तिकरण का भी एक मजबूत जरिया बन रही है। मनरेगा से निर्मित डबरी-तालाबों का अब मछली पालन के लिए उपयोग होने से जल संसाधनों का समुचित उपयोग हो रहा है।

जिला प्रशासन और बस्तर सेवक मंडल का यह संयुक्त प्रयास बताता है कि यदि सही योजना और मार्गदर्शन मिले, तो ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

लाभार्थियों की प्रतिक्रिया
बीज वितरण प्राप्त करने वाले कई लाभार्थियों ने खुशी जताते हुए बताया कि उन्हें पहले कभी मछली पालन की इतनी विस्तृत जानकारी नहीं मिली थी। अब उन्हें उम्मीद है कि वे इस योजना से घर बैठे अच्छा लाभ कमा पाएंगे।

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