बलरामपुर। छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के आदिवासी समाज के लिए एक बड़ी और गर्व की खबर सामने आई है। झारखंड के गुमला जिले के उरांव आदिवासी समुदाय से आने वाले डॉ. अनाबेल बेन्जामिन बड़ा को एक बार फिर यूनेस्को की “ग्लोबल टास्क फोर्स ऑन इंडिजिनस लैंग्वेजेस” की संचालन समिति का सह-अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह जिम्मेदारी उन्हें वर्ष 2025-2027 के कार्यकाल के लिए दी गई है। इससे पहले वे 2022-24 तक इसी पद पर कार्य कर चुके हैं। ( Dr. Anabel Benjamin Bada reassigned to UNESCO task force, tribal society happy)
बलरामपुर जिले के सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष बसंत कुजूर ने इस उपलब्धि को पूरे आदिवासी समाज के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. बड़ा की यह पुनर्नियुक्ति वैश्विक स्तर पर आदिवासी भाषाओं और उनके अधिकारों के संरक्षण की दिशा में उनके समर्पण और योगदान की एक बड़ी मान्यता है।
डॉ. बड़ा वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ (FMS) में सहायक प्रोफेसर हैं। उन्होंने हमेशा ही आदिवासी समुदाय की आवाज को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का काम किया है। उनके नेतृत्व में आदिवासी भाषाओं और संस्कृति को लेकर किए गए प्रयासों को संयुक्त राष्ट्र समेत कई वैश्विक मंचों पर सराहा गया है।
पहला युवा आदिवासी जिन्हें मिला ये सम्मान
डॉ. अनाबेल बेन्जामिन बड़ा एशिया के पहले ऐसे युवा आदिवासी हैं जिन्हें यूनेस्को के इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर दोबारा सह-अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। उनकी नियुक्ति आदिवासी समुदाय की प्रतिभा, संघर्ष और योगदान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाण है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा, खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO), आदिवासी अधिकारों पर स्थायी मंच, और अन्य वैश्विक संस्थाओं में आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व किया है। वे आदिवासी अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक के साथ भी चर्चाएं कर चुके हैं।
आदिवासी भाषाओं और डिजिटल समावेशन की बुलंद आवाज
अपने पहले कार्यकाल के दौरान डॉ. बड़ा ने विश्वभर की आदिवासी भाषाओं को पुनर्जीवित करने और उनकी पहचान को बढ़ावा देने के लिए कई अहम पहल की थी। वे “डिजिटल समानता और डोमेन” नामक एड-हॉक समूह के सह-अध्यक्ष भी हैं, जो यूनेस्को के अधीन कार्यरत ग्लोबल टास्क फोर्स का हिस्सा है। यह समूह आदिवासी समुदायों के डिजिटल समावेशन को सुनिश्चित करने की दिशा में काम करता है।
डॉ. बड़ा की इस भूमिका से यह साफ होता है कि वे न केवल भाषाई संरक्षण बल्कि डिजिटल युग में आदिवासी समुदायों को आगे लाने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।
समाज में खुशी की लहर
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर उरांव समाज सहित समस्त आदिवासी समाज में खुशी की लहर है। लोग सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से डॉ. बड़ा को बधाई दे रहे हैं। बसंत कुजूर सहित कई आदिवासी संगठनों ने उम्मीद जताई है कि डॉ. बड़ा आने वाले वर्षों में आदिवासियों की भाषा, संस्कृति और पहचान को वैश्विक स्तर पर और मजबूती से रखेंगे।