उत्तर प्रदेश सरकार ने जनता की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए ‘जनसुनवाई पोर्टल’ की शुरुआत बड़े इरादे से की थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा थी कि आम लोगों को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और उनकी समस्याओं का समाधान घर बैठे ही हो जाए। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
आज यह पोर्टल नौकरशाही की लापरवाही और फर्जीवाड़े का अड्डा बन गया है। शिकायतों को बिना जांच के निस्तारित दिखा देना, पीड़ितों पर उल्टे मुकदमे दर्ज कर देना और लीपापोती करके खुद को ‘सक्रिय’ साबित करना – यही इस सिस्टम का नया चेहरा बनता जा रहा है।
कागज़ों में निस्तारण, ज़मीन पर अंधेरगर्दी
लखनऊ के बीकेटी तहसील स्थित सहादत नगर गढ़ा गांव के कुछ किसानों और पूर्व प्रधान ने अपने गांव की सरकारी ज़मीनों – तालाब, चकमार्ग, नाली, परती और बंजर ज़मीन – पर अवैध कब्जे की शिकायत जनसुनवाई पोर्टल पर की थी।
उनका आरोप था कि ‘नीरू मेमोरियल सोसाइटी’ के संचालक अनिल अग्रवाल ने ग्राम पंचायत की इन बेशकीमती ज़मीनों पर कब्जा कर लिया है। पहले उन्होंने तहसील स्तर पर शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने पोर्टल पर शिकायत डाली, लेकिन अफसरों ने बिना मौके पर जांच किए ही गलत रिपोर्ट लगाकर केस को निस्तारित घोषित कर दिया।
फिर आई आफत, शिकायत की सज़ा मिली
जिस न्याय की उम्मीद लेकर किसानों ने पोर्टल पर शिकायत की थी, वही उनके लिए बड़ी मुसीबत बन गई। तहसील के अधिकारियों और लेखपाल ने न सिर्फ शिकायत को खारिज कर दिया, बल्कि दबाव बनाने लगे कि किसान अपनी शिकायत वापस लें। जब किसानों ने दबाव में आने से मना किया, तो उल्टे उन पर ही राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत मुकदमा ठोक दिया गया।
यानी एक तरफ तो सरकारी ज़मीन पर कब्जा करने वाले को खुली छूट, और दूसरी तरफ उसकी शिकायत करने वाले पर ही कार्रवाई! इससे बड़ा मजाक क्या होगा?
फर्जी रिपोर्टों का खेल, सत्यापन गायब
शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी ने मौके पर आए बिना ही रिपोर्ट बनाकर तहसील को भेज दी और फाइल क्लोज कर दी गई। सरकार की मंशा थी कि पोर्टल से लोगों की दौड़भाग बचे, लेकिन अब लोग एक ही शिकायत को लेकर बार-बार चक्कर काटने को मजबूर हैं।
न सिर्फ सहादत नगर बल्कि पूरे प्रदेश में सैकड़ों ऐसी शिकायतें हैं, जो सिर्फ कागज़ों पर ही सुलझ गईं। चाहे वो सरकारी ज़मीनों पर कब्जा हो, राशन वितरण में गड़बड़ी, छात्रवृत्ति में धांधली या नालियों की सफाई – हर विभाग में यही कहानी दोहराई जा रही है।
सरकार की छवि को लग रही है चोट
प्रदेश सरकार की छवि ईमानदार और सख्त प्रशासक की रही है, लेकिन अफसरों की ये लापरवाही उसे नुकसान पहुंचा रही है। आंकड़ों में ‘समाधान’ दिखाकर अधिकारी वाहवाही लूट रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत इसके उलट है।
अगर वक्त रहते जनसुनवाई पोर्टल की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं हुआ, तो यह मुद्दा चुनावी राजनीति में सरकार के खिलाफ हथियार बन सकता है।
किसानों की नई शिकायत और उम्मीद की किरण
शिकायत खारिज होने और मुकदमा झेलने के बावजूद किसानों ने हार नहीं मानी। उन्होंने दोबारा जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत की और पूर्व शिकायत संदर्भ संख्या-410157250002665 को दोबारा खुलवाने की मांग की। उन्होंने साफ कहा कि लेखपाल ने फर्जी रिपोर्ट लगाई है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
किसानों का कहना है कि अधिकारी ‘नीरू मेमोरियल सोसाइटी’ को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वह अपनी योजना के बीच आ रही इन ज़मीनों की अदला-बदली कर सके। बताया जा रहा है कि सोसाइटी, ग्राम की कीमती ज़मीन के बदले सस्ती और अनुपयोगी ज़मीन शासन को देने की कोशिश कर रही है – और कुछ अफसर इसमें पूरा सहयोग कर रहे हैं।
क्या कहता है प्रशासन?
इस पूरे मामले पर अब तक तहसील या जिला प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। लेकिन किसानों की दोबारा की गई शिकायत के बाद यह देखना जरूरी होगा कि इस बार जांच निष्पक्ष होगी या फिर वही पुराने ढर्रे पर फर्जी निस्तारण करके मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा।
जनता के विश्वास की असली परीक्षा
जनसुनवाई पोर्टल का मकसद था कि आम आदमी को प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ाव और समाधान मिले। लेकिन जब शिकायतकर्ता को ही उत्पीड़न का सामना करना पड़े, तो ऐसे सिस्टम का कोई औचित्य नहीं रह जाता।