बलरामपुर, छत्तीसगढ़। सरकार ने गरीबों की थाली में अन्न पहुंचाने के लिए पीडीएस यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System) शुरू की थी। इसका मकसद था – कोई भूखा न सोए। लेकिन बलरामपुर जिले में अब यह योजना अपने असली मकसद से भटकती नजर आ रही है। गरीबों को जो राशन मुफ़्त या सस्ते में दिया जा रहा है, वही अब खुलेआम बेचा जा रहा है – और वो भी स्थानीय किराना दुकानों में।
राशन लेने के बाद सीधे ‘कैश काउंटर’ की ओर!
यहाँ कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ राशन दुकान से जैसे ही हितग्राही चावल, शक्कर और अन्य सामान लेकर बाहर निकलते हैं, वैसे ही वे पास के किसी किराना दुकानदार के पास जाकर उसे बेच देते हैं। और बदले में नकद पैसे ले लेते हैं।
जैसे यह एक तयशुदा प्रक्रिया हो – राशन दुकान से माल निकला और 10 कदम बाद ही नकद में बेच दिया गया।
खुला खेल, बेधड़क धंधा
इस पूरे मामले की सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि यह काम अब छुपकर नहीं, बल्कि खुलेआम हो रहा है। न कोई शर्म, न किसी कार्रवाई का डर। राशन का ऐसा खुलेआम लेन-देन अब आम होता जा रहा है।
कई स्थानीय लोगों ने बताया कि उन्हें कई बार खुद यह नजारा देखने को मिला – कोई महिला या पुरुष राशन लेकर निकला और थोड़ी ही देर में उसी थैले को लेकर किराना दुकान पर सौदा करते देखा गया।
योजना गरीबों के लिए या लालची लोगों के लिए?
सरकार की यह योजना उन लोगों के लिए है, जिनके घर चूल्हा मुश्किल से जलता है। लेकिन अब यह योजना कईयों के लिए कमाई का जरिया बन गई है। हितग्राही खुद कहते हैं, “हमें राशन की ज़रूरत नहीं, पैसे ज़्यादा ज़रूरी हैं।”
वहीं दुकानदारों का कहना है, “सस्ते में माल मिल रहा है, तो क्यों न खरीदें?”
इस खेल में सभी की हिस्सेदारी है — लाभार्थी, दुकानदार और कहीं न कहीं जिम्मेदार अधिकारी भी।
जिम्मेदार कौन? और कार्रवाई कहां?
यह कहना गलत नहीं होगा कि इस गड़बड़ी के पीछे सिस्टम की ढील और निगरानी की कमी है। अगर प्रशासन इस पर गंभीरता से नजर रखे, तो ऐसी घटनाएं रुक सकती हैं। लेकिन अब तक ना कोई सख्त कार्रवाई हुई है और ना ही कोई सुधार नजर आ रहा है।
समाधान क्या हो सकता है?
इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है:
जो हितग्राही राशन बेचते पकड़े जाएं, उनके राशन कार्ड रद्द किए जाएं।
राशन खरीदने वाले दुकानदारों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए।
नियमित जांच के लिए निगरानी टीम बनाई जाए।
डिजिटल ट्रैकिंग और फिंगरप्रिंट आधारित ऑडिट सिस्टम लागू किया जाए।
इन सभी उपायों से ही यह तय किया जा सकता है कि राशन वास्तव में उसी व्यक्ति तक पहुंचे, जिसे इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है।
सवाल उठता है – क्या अब भी पीडीएस गरीबों का सहारा है?
यह सोचने की बात है कि जिस योजना को लेकर सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, वह सही हाथों तक पहुंच भी रही है या नहीं? अगर राशन को यूं ही बेचा जाता रहा और जिम्मेदार आंखें मूंदे रहे, तो आने वाले वक्त में यह योजना अपने मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटक जाएगी।