Lucknow विकास प्राधिकरण (LDA) की कार्यशैली एक बार फिर से कठघरे में है। जिस अवैध निर्माण पर प्राधिकरण ने जनवरी 2024 में बुलडोजर चलाकर गिरा दिया था, वही निर्माण दोबारा खड़ा हो गया है। हैरानी की बात ये है कि यह सब कुछ एलडीए के अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ है। बिल्डरों की मनमानी और अफसरों की चुप्पी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या एलडीए अब Corruption का अड्डा बनता जा रहा है?
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के मुताबिक, एलडीए के प्रवर्तन जोन-5 क्षेत्र में अस्ती रोड, बीकेटी स्थित विसमासूल स्कूल के पास, नायरा पेट्रोल पंप के सामने करीब तीन बीघा ज़मीन पर 42 रो-हाउस अवैध रूप से बनाए गए थे। संदीप सिंह और अर्जुन सिंह नामक बिल्डरों ने बिना किसी अधिकृत मानचित्र स्वीकृति के इन भवनों का निर्माण कार्य शुरू किया था।
जब यह बात एलडीए तक पहुंची, तो कार्रवाई करते हुए विहित न्यायालय के आदेश पर 29 जनवरी 2024 को सभी 42 अवैध रो-हाउस को ढहा दिया गया था। इस कार्रवाई की अगुवाई तत्कालीन जोनल अधिकारी संजय जिंदल ने की थी, जिनके साथ सहायक अभियंता एनएन चौबे, संजय मिश्रा और सुभाष शर्मा भी मौजूद थे। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलाया गया।
लेकिन फिर कैसे खड़े हो गए ये रो-हाउस?
यही सवाल अब शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। ध्वस्तीकरण के बाद बिल्डर ने अधिकारियों से मिलीभगत कर एक बार फिर निर्माण कार्य शुरू करवा दिया। न केवल दीवारें खड़ी हुईं, बल्कि भवनों की फिनिशिंग तक हो गई। इतना ही नहीं, कुछ भवन तो इतने तैयार हो चुके हैं कि उनमें अब बसावट की तैयारी चल रही है।
शिकायत मिलने के बाद एलडीए के विहित प्राधिकारी ने फिर से जांच के आदेश दिए, लेकिन अब यह जांच भी सवालों के घेरे में है। आखिर, जिन अफसरों की मिलीभगत से फिर से निर्माण हुआ, क्या वही जांच निष्पक्ष रूप से कर पाएंगे?
सीलिंग के बावजूद चला निर्माण
यह कोई पहली बार नहीं था जब एलडीए ने इस कॉलोनी में कार्रवाई की हो। इससे पहले दो बार एलडीए द्वारा इस साइट को सील भी किया गया था। साथ ही स्थानीय थाने में एफआईआर के लिए तहरीर भी दी गई थी। लेकिन बिल्डर ने अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकते हुए चोरी-छुपे निर्माण कार्य जारी रखा और सील तक तोड़ दी।
अब जबकि अवैध निर्माण दोबारा सामने आ गया है, तो यह साफ हो गया है कि बिल्डर और एलडीए अफसरों की मिलीभगत से यह सब हो रहा है।
जनता के साथ धोखा
बिल्डरों ने इन रो-हाउस को बेचने की योजना पहले ही बना ली थी और कई खरीदारों से पैसे भी वसूल लिए गए थे। लेकिन न तो उनकी रजिस्ट्री हुई और न ही निर्माण वैध था। अब जब अवैध निर्माण दोबारा खड़ा कर दिया गया है, तो इसमें रहने वालों की सुरक्षा, कानूनी अधिकार और सुविधाएं अधर में लटक गई हैं।
शासन और प्रशासन की चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस अवैध निर्माण को खुद एलडीए ने गिराया था, वो फिर से कैसे तैयार हो गया? क्या राज्य शासन और नगर विकास मंत्रालय को इस दोबारा निर्माण की भनक तक नहीं लगी? या फिर जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है? यह मामला अब सिर्फ एलडीए की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र में फैले भ्रष्टाचार और लापरवाही की गहरी परतों को उजागर कर रहा है।
जांच नहीं, सख्त कार्रवाई हो
अब वक्त आ गया है कि एलडीए में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों की पहचान कर उन पर सख्त कार्रवाई की जाए। जांच से ज्यादा जरूरी है जिम्मेदारों को दंडित करना ताकि दोबारा कोई बिल्डर अवैध निर्माण करने की हिम्मत न करे और कोई अधिकारी नियमों की धज्जियां न उड़ाए।