साँची (मध्यप्रदेश)। साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में रविवार को गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित एक प्रेरणादायक परिचर्चा का आयोजन हुआ। इस आयोजन में भारतीय शिक्षण मंडल की सहभागिता रही। चर्चा में वक्ताओं ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आत्मा मानी जाने वाली गुरु-शिष्य परंपरा को आज के समय में और अधिक प्रासंगिक बताते हुए इसके पुनरुद्धार की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलसचिव और डीन प्रो. नवीन कुमार मेहता ने गुरु-शिष्य की ऐतिहासिक परंपरा को वर्तमान से जोड़ते हुए कहा, “ज्ञान से पवित्र इस दुनिया में कुछ नहीं है।” उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और उनके गुरु संदीपनि, चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य, विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस, शिवाजी और उनके गुरु रामदास स्वामी के बीच के रिश्तों को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एक अच्छा गुरु अपने शिष्य को केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि उसका व्यक्तित्व भी गढ़ता है।
वहीं, भारतीय शिक्षण मंडल के क्षेत्रीय संगठन मंत्री कौशल प्रताप सिंह ने शिक्षा प्रणाली में भारतीयता को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा, “भारत को भारत बनाए रखने के लिए हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जिसमें भारतीय संस्कृति, मूल्य और आत्मा समाहित हो। देश की शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम और प्रणाली सबकुछ हमारी परंपरा के अनुसार होनी चाहिए।”
परिचर्चा में प्रांतीय अध्यक्ष प्रो. हरिहर वसंत गुप्ता ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन में अनेक ऐसे क्षण आते हैं, जब कोई वस्तु या व्यक्ति उसके जीवन में गहरा असर डालता है, वही उसका गुरु बन जाता है। उन्होंने कहा, “हर बच्चे की पहली गुरु उसकी मां होती है, जो उसे सबसे पहले जीवन और मूल्यों का पाठ पढ़ाती है।”
प्रो. गुप्ता ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षकों को अपने छात्रों के साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहिए ताकि ज्ञान का प्रभाव छात्रों के व्यवहार और व्यक्तित्व में दिखे। उन्होंने बताया कि भारतीय शिक्षण मंडल की ओर से भारतीय ज्ञान पर आधारित पुस्तक लेखन के लिए छात्रों को सवा लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता भी दी जाएगी।
साँची विश्वविद्यालय के शिक्षा विभागाध्यक्ष डॉ. प्रभाकर पांडे ने गीता के श्लोकों के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा की गहराई समझाई। उन्होंने कहा कि जिस छात्र में ज्ञान के प्रति श्रद्धा, सीखने की तत्परता और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता होती है, वह सफलता जरूर पाता है। डॉ. पांडे ने यह भी बताया कि परिवार ही किसी व्यक्ति की पहली पाठशाला होता है, और बदलाव वहीं से शुरू होता है।
इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने वक्ताओं से गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़े कई प्रश्न पूछे और विचार-विमर्श के माध्यम से अपने संदेहों का समाधान भी पाया।
परिचर्चा का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारत की प्राचीन शिक्षण प्रणाली और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना था। इस अवसर पर शिक्षा विभाग और अन्य संकायों के शिक्षकगण, छात्रगण और भारतीय शिक्षण मंडल के सदस्य उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में यह संदेश भी दिया गया कि आधुनिक शिक्षा में तकनीक और विकास तो जरूरी हैं, लेकिन यदि गुरु-शिष्य परंपरा जैसी भारतीय जड़ें मजबूत रहें, तो शिक्षा का उद्देश्य और भी प्रभावी और सार्थक होगा।