सत्येंद्र पांडे, भोपाल।
प्रदेश में एक तरफ सरकार “नशे से दूरी है जरूरी” जैसे जन-जागरूकता अभियान चला रही है, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। ओबेदुल्लागंज नगर में शराब के ठेकों के आस-पास का माहौल इस नीति की पोल खोलता नजर आ रहा है। यहां खुलेआम जाम छलक रहे हैं, लोग ठेके के सामने और बगल की दुकानों में बैठकर आराम से शराब पी रहे हैं, और प्रशासन पूरी तरह मौन है।
अहाता बंदी के बाद भी ‘मदिरा पार्क’ जैसा नजारा
वर्ष 2023 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई शराब नीति के तहत अहातों (शराब पीने की जगहों) को बंद करने का ऐलान किया था, तब इसका मकसद साफ था—सार्वजनिक स्थलों पर शराबखोरी को रोकना और कानून व्यवस्था को बेहतर बनाना। मगर ओबेदुल्लागंज में दो शराब दुकानों के पास जो नजारा दिखता है, वह इस उद्देश्य को ठेंगा दिखाता है।
शाम होते ही ठेकों के पास किराए पर ली गई दुकानों में बाकायदा बैठने की सुविधा, खाने-पीने की व्यवस्था और सामने लगे ठेलों पर खड़े होकर खुलेआम शराब पीते लोग दिखाई देते हैं। यह इलाका मुख्य बाजार और हाईवे के बीच स्थित है, जहां से प्रशासनिक गाड़ियां भी गुजरती हैं, लेकिन शायद किसी की नजर इस पर नहीं पड़ती—or जानबूझकर अनदेखा किया जाता है।
“नशे से दूरी” अभियान सिर्फ दिखावा?
जिला प्रशासन और आबकारी विभाग 15 से 30 जुलाई तक “नशे से दूरी है जरूरी” अभियान चला रहा है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ दिखावा है। गांवों और छोटे ढाबों पर छापे मारकर फोटो खिंचवाने भर की कार्रवाई हो रही है, जबकि असल में जो अव्यवस्था शहरों और हाईवे किनारे पसरी है, वहां कोई कार्रवाई नहीं होती।
मांसाहार और कब्जे ने बिगाड़ी व्यवस्था
ठेकों के आसपास स्थित दुकानों में मांसाहारी भोजन की भी खुली बिक्री हो रही है। कई दुकानें तो हाईवे तक कब्जा कर चुकी हैं, जिससे न केवल यातायात बाधित होता है बल्कि दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ गई है। इतना ही नहीं, शराब के नशे में धुत लोग अकसर मारपीट और अपराधों को अंजाम दे देते हैं, जिससे पूरे इलाके की शांति और सुरक्षा प्रभावित होती है।
क्या यही है कानून व्यवस्था?
स्थानीय निवासी भूपेंद्र सक्सेना कहते हैं, “बाजार और हाईवे स्थित दुकानों पर चल रही खुल्ली आम शराबखोरी प्रशासन की कथनी और करनी में फर्क को उजागर करती है। इसके सामाजिक दुष्परिणाम जरूर सामने आएंगे।”
सवाल ये है कि अगर अहाता बंद कर देना ही समाधान था, तो ठेके के आस-पास चल रही इन वैकल्पिक बैठकों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? कानून व्यवस्था के नाम पर की गई कोशिशें क्या वाकई सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
जनता की चिंता जायज़ है
स्थानीय लोगों की चिंता यह है कि इन शराब ठेकों और उससे जुड़ी गतिविधियों से न केवल युवाओं पर गलत असर पड़ रहा है, बल्कि यह पूरे समाज को धीरे-धीरे नशे की गिरफ्त में धकेल रहा है। ऐसे में “नशे से दूरी” जैसे अभियान तब तक बेमतलब रहेंगे, जब तक जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती।